लिंगो का पूजन तप कहलाता है : इंदुभवानंद तीर्थ

लिंगो का पूजन तप कहलाता है :  इंदुभवानंद तीर्थ

रायपुर। श्री शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला रायपुर में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए श्री शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इंदुभवानंद  तीर्थ महाराज ने बताया कि लिंगो का पूजन करना *तप* कहलाता है। जो निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा का प्रतीक है। शिवलिङ्ग ही होता है। इसीलिए शिवजी का समस्त पूजन शिवलिंग में ही होता है। संस्कृत भाषा में लिंग का अर्थ पहचान (चिन्ह) होता है। शिव की पहचान शिवलिंग ही है। अनेक प्रकार के शिवलिंगों का वर्णन शास्त्रों में प्राप्त होता है। सूक्ष्म लिंग प्रणव (ओंकार) को कहा जाता है,सूक्ष्म लिंग ही निष्कल कहलाता है। पंचाक्षर मंत्र को स्थूल लिंग कहा जाता कहा है। इन दोनों प्रकार के लिंगो का पूजन *तप* कहलाता है।
प्रथम स्वयंभू लिंग है, दूसरा बिंदु लिंग, तीसरा प्रतिष्ठित लिंग, चौथा चर लिंग और पांच गुरु लिंग। देवर्षि  की तपस्या से संतुष्ट होकर के उनके आसपास बीज रूप में व्याप्त भगवान शिव पृथ्वी फाड़ कर जब निकलते हैं तब उसे स्वयंभू लिंग कहा जाता है। स्वयं भू लिंग के पूजन करने से व्यक्ति को पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति होती है। सोने चांदी अथवा भूमि पर बेदी बनाकर प्रणव लिखकर जिसका पूजन किया जाता है, वह बिंदु लिंग कहलाता है। संत महात्माओं के द्वारा जिसकी प्रतिष्ठा की जाती है वह प्रतिष्ठित लिंग कहलाता है और जिसकी चल प्रतिष्ठा की जाती है वह चर लिंग कहलाता है गुरु को भी साक्षात भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है और उसके स्वरूप की पूजा की जाती है वह पूजा गुरु लिंग के रूप में ही होती है इसलिए गुरु को भी गुरु  लिंग कहा जाता है। गुरु के चरणों की उपासना करने से व्यक्ति भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर लेता है शास्त्रों में शिव व गुरु में कोई भेद नहीं यहां तक लिखा है कि यदि भगवान शंकर रुष्ट हो जाए तो गुरु यदि प्रसन्न हो तो शिव की कृपा भी उसको सहज ढंग से प्राप्त हो जाती है कथा के पूर्व समस्त शिवभक्तों ने शिव पुराण ग्रंथ की पोथी का पूजन कर आरती की। शंकराचार्य आश्रम के छात्रों ने वैदिक मंगलाचरण का पाठ किया।