दुष्कर्म पीड़िता की आत्महत्या पर हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी; आरोपी की 10 साल की सजा बरकरार
कहा- "ऐसी घटनाओं से टूट जाता है महिला का आत्मसम्मान"
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Bilaspur High Court) ने महिलाओं के विरुद्ध होने वाले जघन्य अपराधों पर एक बेहद महत्वपूर्ण और सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने एक बलात्कार पीड़िता द्वारा लोक-लाज और मानसिक प्रताड़ना के कारण की गई आत्महत्या के मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी की 10 वर्ष की सश्रम कारावास की सजा को यथावत रखा है।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी महिला के आत्मसम्मान और गरिमा को ठेस पहुंचाना उसे मौत के मुंह में धकेलने जैसा है। ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती।
क्या था पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला कुछ समय पूर्व का है जहां दोषी व्यक्ति ने पीड़िता की मर्जी के खिलाफ उसके साथ अनाचार (बलात्कार) की घटना को अंजाम दिया था। इस घटना के बाद आरोपी द्वारा पीड़िता को लगातार डराया-धमकाया जा रहा था। समाज में बदनामी के डर और इस भयानक मानसिक आघात (Mental Trauma) को सहन न कर पाने के कारण पीड़ित युवती ने अंततः आत्मघाती कदम उठाते हुए फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली थी।
निचली अदालत (Sessions Court) ने साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर आरोपी को दोषी पाते हुए 10 वर्ष के कड़े कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील दायर कर सजा को कम करने या रद्द करने की गुहार लगाई थी।
हाई कोर्ट की बेहद तल्ख और ऐतिहासिक टिप्पणी
जस्टिस की एकल पीठ ने आरोपी की अपील को पूरी तरह से खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया। मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा: "बलात्कार केवल एक शारीरिक चोट नहीं है, बल्कि यह एक महिला की आत्मा और उसके सर्वोच्च सम्मान पर किया गया सबसे क्रूर प्रहार है। एक समाज के रूप में हम ऐसी घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते। अनाचार के बाद जब किसी पीड़िता को समाज का सामना करना पड़ता है और उसे न्याय मिलने में संशय दिखता है, तो उसका आत्मसम्मान पूरी तरह टूट जाता है। इसी मानसिक बेबसी के चलते वह आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर होती है। अतः ऐसी परिस्थिति पैदा करने वाला अपराधी किसी भी प्रकार की सहानुभूति का हकदार नहीं है।"
सजा बरकरार; समाज के लिए कड़ा संदेश
हाई कोर्ट ने अभियोजन पक्ष (Prosecution) द्वारा प्रस्तुत किए गए फॉरेंसिक साक्ष्यों, पीड़िता के मृत्युपूर्व बयानों/परिस्थितियों और गवाहों के बयानों को पुख्ता माना। अदालत ने कहा कि आरोपी का यह कृत्य न केवल एक व्यक्ति के खिलाफ, बल्कि संपूर्ण सामाजिक ताने-बाने के खिलाफ अपराध है।
अदालत का आदेश: आरोपी की याचिका को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया है और उसे अपनी शेष जेल की सजा काटने के लिए वापस केंद्रीय जेल भेजने के निर्देश दिए गए हैं।

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