PMOS के बावजूद मां बनना संभव, सही इलाज और जीवनशैली से बढ़ सकती है गर्भधारण की संभावना
हार्मोनल असंतुलन के कारण ओव्यूलेशन प्रभावित होने से गर्भधारण में आती है दिक्कत, विशेषज्ञ ने वजन, खानपान और समय पर इलाज को बताया अहम
रायपुर। महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन से जुड़ी PMOS की समस्या प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती है। इसके कारण मासिक धर्म अनियमित होने, पीरियड्स मिस होने और ओव्यूलेशन प्रभावित होने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। ऐसे में कई महिलाओं के मन में सवाल रहता है कि क्या PMOS होने के बावजूद वे गर्भवती हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार PMOS के बावजूद गर्भधारण संभव है। हालांकि कुछ महिलाओं को जीवनशैली में बदलाव, दवाओं या जरूरत पड़ने पर फर्टिलिटी उपचार की मदद लेनी पड़ सकती है।
एमएमआई नारायणा मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल, रायपुर की कंसल्टेंट ऑब्स्ट्रेट्रिक्स एवं गायनोकोलॉजी डॉ. रिचा चौबे के अनुसार, PMOS महिलाओं में प्रजनन क्षमता से जुड़ी समस्याओं के साथ वजन बढ़ना, मेटाबोलिक बदलाव और बाल झड़ने जैसी परेशानियां भी पैदा कर सकता है। सही समय पर समस्या की पहचान और उपचार से गर्भधारण की संभावना बेहतर की जा सकती है।
एक नजर में
• PMOS वाली महिलाएं गर्भवती हो सकती हैं
• हार्मोनल असंतुलन के कारण ओव्यूलेशन प्रभावित हो सकता है
• अनियमित पीरियड्स का मतलब हमेशा ओव्यूलेशन होना नहीं है
• वजन नियंत्रित करना उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है
• डॉक्टर की सलाह से ओव्यूलेशन बढ़ाने वाली दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है
• इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति में मेटफॉर्मिन जैसी दवाएं इस्तेमाल की जा सकती हैं
• जरूरत पड़ने पर IVF जैसी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव तकनीकों की मदद ली जा सकती है
• गर्भावस्था के बाद भी PMOS के प्रबंधन के लिए नियमित चिकित्सकीय सलाह जरूरी है
हर पांच में से एक महिला में समस्या
PMOS को लेकर उपलब्ध भारतीय अध्ययन में प्रजनन आयु की महिलाओं में इसकी व्यापकता को लेकर चिंता सामने आई है। वर्ष 2018 से 2022 के बीच किए गए ICMR PCOS अध्ययन में देशभर में करीब 10 हजार महिलाओं की जांच की गई। अध्ययन में 18 से 40 वर्ष की आयु वाली महिलाओं में इसकी राष्ट्रीय दर 19.6 प्रतिशत बताई गई।
अध्ययन में PMOS से जुड़े मेटाबोलिक जोखिमों की ओर भी ध्यान दिलाया गया। पहचान की गई महिलाओं में 91.9 प्रतिशत में ब्लड फैट का स्तर असामान्य पाया गया, जबकि 43.2 प्रतिशत महिलाएं मोटापे से प्रभावित थीं। करीब एक चौथाई महिलाओं में मेटाबोलिक सिंड्रोम के मानदंड पाए गए।
PMOS क्या है?
PMOS एक हार्मोनल स्थिति है, जिसमें शरीर के हार्मोनल संतुलन में बदलाव के कारण अंडाशय से जुड़ी सामान्य प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसका असर मासिक धर्म चक्र और ओव्यूलेशन पर पड़ सकता है।
इस स्थिति से पीड़ित महिलाओं में पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं या कई बार पीरियड्स मिस हो सकते हैं। ओव्यूलेशन का समय भी अनिश्चित हो सकता है।
यही वजह है कि गर्भधारण की योजना बना रही महिलाओं के लिए ओव्यूलेशन की स्थिति को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।
पीरियड्स आना और ओव्यूलेशन होना एक बात नहीं
कई महिलाओं को लगता है कि यदि हर महीने पीरियड्स हो रहे हैं तो निश्चित रूप से ओव्यूलेशन भी हो रहा होगा। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता।
गर्भधारण के लिए ओव्यूलेशन जरूरी है। PMOS में हार्मोनल बदलाव के कारण अंडे के विकसित होने और समय पर बाहर निकलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इससे गर्भधारण में देरी हो सकती है।
वजन कम करने से मिल सकता है फायदा
PMOS के प्रबंधन में वजन नियंत्रित करना महत्वपूर्ण माना जाता है। उपलब्ध शोध के अनुसार PMOS वाली महिलाओं में मोटापे की समस्या आम हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जिन महिलाओं का वजन अधिक है, उनमें धीरे धीरे वजन कम करने से ओव्यूलेशन में सुधार हो सकता है। कुछ मामलों में छह महीने के दौरान शरीर के वजन में 5 से 10 प्रतिशत तक कमी भी ओव्यूलेशन को बेहतर करने में मदद कर सकती है।
हालांकि वजन कम करने का लक्ष्य हर महिला के लिए अलग हो सकता है। इसलिए डाइट और व्यायाम की योजना डॉक्टर या योग्य विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार बनाना बेहतर है।
दवाओं से ओव्यूलेशन में मदद
जिन महिलाओं को ओव्यूलेशन से जुड़ी समस्या के कारण गर्भधारण में परेशानी हो रही है, उन्हें डॉक्टर कुछ दवाएं दे सकते हैं।
लेट्रोजोल जैसी दवाओं का इस्तेमाल ओव्यूलेशन को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है। क्लोमीफीन भी कुछ मामलों में इस्तेमाल की जाती है।
इन दवाओं के साइड इफेक्ट हो सकते हैं। क्लोमीफीन के साथ हॉट फ्लैशेस जैसी समस्या हो सकती है, जबकि लेट्रोजोल के साथ चक्कर या थकान जैसी परेशानी महसूस हो सकती है। इसलिए इन दवाओं का इस्तेमाल बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं किया जाना चाहिए।
मेटफॉर्मिन की भी हो सकती है भूमिका
PMOS से जुड़ी कुछ महिलाओं में इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या देखी जा सकती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर मेटफॉर्मिन जैसी दवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं।
कुछ मामलों में इसे ओव्यूलेशन से जुड़ी अन्य दवाओं के साथ भी इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि किस महिला को कौन सी दवा और किस मात्रा में दी जानी है, यह उसकी स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।
जरूरत पड़ने पर IVF और ART की मदद
यदि जीवनशैली में बदलाव और दवाओं के बावजूद गर्भधारण नहीं हो पाता है, तो विशेषज्ञ आवश्यकता के अनुसार असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी यानी ART की सलाह दे सकते हैं।
इसमें IVF, ICSI और अन्य फर्टिलिटी प्रक्रियाएं शामिल हो सकती हैं। IVF में अंडाणु और शुक्राणु को प्रयोगशाला में मिलाकर भ्रूण तैयार किया जाता है, जिसे आगे गर्भाशय में स्थानांतरित किया जाता है।
ICSI में शुक्राणु को सीधे अंडाणु में इंजेक्ट किया जाता है। कुछ परिस्थितियों में डोनर एग या डोनर स्पर्म जैसी प्रक्रियाओं का भी उपयोग किया जा सकता है।
किसी भी ART प्रक्रिया का चुनाव महिला और उसके पार्टनर की स्थिति, उम्र, प्रजनन क्षमता और अन्य चिकित्सकीय कारणों को देखते हुए किया जाता है।
गर्भावस्था के बाद भी देखभाल जरूरी
PMOS को केवल गर्भधारण तक सीमित समस्या मानना उचित नहीं है। गर्भावस्था होने के बाद भी स्वास्थ्य की नियमित निगरानी जरूरी हो सकती है।
सही वजन बनाए रखना, ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना, संतुलित और पौष्टिक आहार लेना तथा नियमित शारीरिक गतिविधि को जीवनशैली का हिस्सा बनाना मददगार हो सकता है।
गर्भावस्था की योजना बना रही महिलाओं को अपनी स्थिति के अनुसार डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए और खुद से हार्मोन या फर्टिलिटी की दवाएं नहीं लेनी चाहिए।
PMOS का मतलब मां बनने की उम्मीद खत्म होना नहीं
PMOS गर्भधारण में मुश्किल पैदा कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि महिला मां नहीं बन सकती। कई मामलों में ओव्यूलेशन को बेहतर करने, वजन और मेटाबोलिक स्वास्थ्य को नियंत्रित करने तथा जरूरत पड़ने पर फर्टिलिटी उपचार की मदद से गर्भधारण संभव हो सकता है।
सबसे जरूरी है कि महिला समस्या को नजरअंदाज न करे। अनियमित पीरियड्स, लंबे समय तक पीरियड्स न आना या गर्भधारण में लगातार परेशानी होने पर समय पर स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
सही जानकारी, समय पर जांच और व्यक्तिगत उपचार के साथ PMOS के बावजूद मातृत्व की संभावना बनी रहती है।
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