धर्म का फल भागवत्कथा से प्रेम होना है : इंदुभवानंद तीर्थ

धर्म का फल भागवत्कथा से प्रेम होना है : इंदुभवानंद तीर्थ

रायपुर। श्री शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला रायपुर में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इंदुभवानंद  तीर्थ महाराज ने बताया की धर्म का फल भागवत् कथा में प्रेम होना है। बहुत यज्ञ अनुष्ठान पूजन पाठ करने के बाद भी भगवान की कथा से प्रेम नहीं हुआ तो आपका यज्ञ अनुष्ठान पूजन पाठ सब बेकार वह केवल श्रम की गणना में परिवर्तित माना जाएगा श्रम से वस्तुओं का निर्माण होता है, और धर्म से हृदय का निर्माण होता है। जिससे वाह्य वस्तुओं का निर्माण हो  वह श्रम है, जो निर्माण बाहरी चमक दमक के लिए होगा वह श्रम होगा परंतु उससे अन्तःकरण  की शुद्धि नहीं होगी, आप यह बात ध्यान में रखें कि धर्म छुड़ाने के लिए है, बांधने के लिए नहीं होता है। सबका निषेध करके परमात्मा में अवस्थापित करने के लिए धर्म होता है धर्म से ही अपवर्ग की सिद्धि होती है। इसके पालन करने से पाप ,पुण्य, फल, बंध, भोग, माया आदि बंधनों से मुक्ति सहज में ही प्राप्त हो जाती है। अतः अर्थ प्राप्ति धर्म का फल नहीं है अपवर्ग धर्म का फल है अर्थ का फल धर्म है काम व उपभोग नहीं है काम इंद्रियों की तृप्ति के लिए नहीं जीवन निर्वाह के लिए है, जीवन का अर्थ बहुत काम धंधा करके धन कमाना नहीं है अपितु  परमात्मा को जानना है।