जिस ट्रेडमिल पर आज लोग सेहत बनाने के लिए दौड़ते हैं, कभी उससे कैदियों को दी जाती थी दर्दनाक यातना!

जिस ट्रेडमिल पर आज लोग सेहत बनाने के लिए दौड़ते हैं, कभी उससे कैदियों को दी जाती थी दर्दनाक यातना!

लाइफस्टाइल डेस्क: आज के समय में वजन घटाने, पसीना बहाने और खुद को फिट रखने के लिए जिम में ट्रेडमिल (Treadmill) पर दौड़ना एक बेहद आम बात है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस मशीन पर दौड़ने के लिए आज लोग जिम को मोटी फीस देते हैं, उसका इतिहास बेहद खौफनाक और क्रूर रहा है?

जी हां, १९वीं सदी में ट्रेडमिल का आविष्कार किसी को फिट रखने के लिए नहीं, बल्कि जेल में बंद कैदियों को कड़ी सजा और शारीरिक यातना देने के लिए किया गया था। आइए जानते हैं आधुनिक दौर की इस लोकप्रिय फिटनेस मशीन के पीछे का हैरान कर देने वाला काला इतिहास।

१८१८ में हुआ था इस क्रूर मशीन का आविष्कार

साल १८१८ में इंग्लैंड के एक प्रसिद्ध सिविल इंजीनियर सर विलियम क्यूबिट (Sir William Cubitt) ने इस मशीन का खाका तैयार किया था। उस समय इसे 'ट्रेडव्हील' (Treadwheel) कहा जाता था। विलियम क्यूबिट ने जब जेल के कैदियों को आलसी बैठे देखा, तो उन्होंने उनके श्रम का उपयोग करने और उन्हें एक थका देने वाली कड़ी सजा देने के लिए एक विशाल घूमते हुए पहिये जैसी मशीन का निर्माण किया।

कैसे दी जाती थी कैदियों को यातना?

यह मशीन आज की आधुनिक ट्रेडमिल जैसी एक छोटी और सपाट पट्टी नहीं थी, बल्कि एक बहुत बड़ा लकड़ी और लोहे का बेलनाकार (Cylindrical) पहिया होता था, जिसके चारों तरफ सीढ़ियां बनी होती थीं।

  • अंतहीन सीढ़ियां चढ़ना: कैदियों को इस पहिये पर बने स्टेप्स पर पैर रखकर लगातार ऊपर की तरफ चढ़ना पड़ता था। जैसे ही वे पैर रखते, पहिया नीचे घूम जाता था, जिससे कैदियों को लगातार चलते रहना पड़ता था।

  • घंटों की दर्दनाक मशक्कत: कैदी दिन में औसतन ६ से ८ घंटे तक इस मशीन पर लगातार चलने के लिए मजबूर थे। यह शारीरिक रूप से इतनी दर्दनाक सजा थी कि कई कैदी अत्यधिक थकान, चक्कर आने और कुपोषण के कारण मशीन से गिर जाते थे और गंभीर रूप से घायल हो जाते थे।

  • सजा के साथ-साथ काम: इस अमानवीय शारीरिक श्रम का उपयोग जेल प्रशासन अनाज पीसने (Grinding Grain) या पानी पंप करने के लिए करता था। चूंकि यह एक चक्की (Mill) की तरह काम करती थी जिस पर पैर (Tread) चलाए जाते थे, इसीलिए इसका नाम 'टread-mill' (ट्रेडमिल) पड़ा।

बैन होने से लेकर 'फिटनेस टूल' बनने का सफर

क्रूरता की सभी हदें पार करने के कारण साल १८९८ में ब्रिटिश जेल अधिनियम (British Prisons Act) के तहत इस अमानवीय सजा पर पूरी तरह से प्रतिबंध (Ban) लगा दिया गया। इसके बाद कई दशकों तक यह मशीन इतिहास के पन्नों में दबी रही।

ट्रेडमिल का पुनर्जन्म साल १९५२ में हुआ, जब डॉ. रॉबर्ट ब्रूस और वेन क्विंटन ने दिल और फेफड़ों की बीमारियों की जांच (Stress Test) करने के लिए एक मेडिकल ट्रेडमिल का आविष्कार किया। इसके बाद १९६० के दशक में जब दुनिया भर में जॉगिंग और फिटनेस का क्रेज बढ़ा, तो इसे घरों और व्यावसायिक जिम के अनुकूल बनाकर एक बेहतरीन कार्डियो मशीन के रूप में दुनिया के सामने पेश किया गया।

एक दिलचस्प विरोधाभास: इतिहासकार अक्सर मजाक में कहते हैं कि कल तक जिस मशीन पर चलने से बचने के लिए कैदी भगवान से प्रार्थना करते थे, आज उसी मशीन पर आधे घंटे दौड़ने के लिए लोग हर महीने जिम की महंगी सदस्यता (Gym Membership) खरीदते हैं। अगली बार जब आप जिम में ट्रेडमिल पर कदम रखें, तो सोचिएगा जरूर कि आप इतिहास की एक सबसे बदनाम सजा को अपनी मर्जी और खुशी से भुगत रहे हैं!