H1N1 संक्रमण में शुरुआती पहचान और समय पर उपचार जरूरी, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को विशेष सावधानी की सलाह

H1N1 संक्रमण में शुरुआती पहचान और समय पर उपचार जरूरी, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को विशेष सावधानी की सलाह

पहले 48 घंटे अहम, स्वाइन फ्लू में इलाज में देरी पड़ सकती है भारी

रायपुर। मौसम में बदलाव के साथ इन्फ्लुएंजा यानी फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा सकती है। H1N1 इन्फ्लुएंजा, जिसे आमतौर पर स्वाइन फ्लू के नाम से जाना जाता है, भी इसी संक्रमण का एक रूप है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके मामलों में शुरुआती पहचान और समय पर उपचार बेहद महत्वपूर्ण है। खासतौर पर संक्रमण के शुरुआती 48 घंटे उपचार के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

एमएमआई हॉस्पिटल, रायपुर की विशेषज्ञ डॉ. दीप्ति मास्के के अनुसार, H1N1 संक्रमण बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों में गंभीर रूप ले सकता है। ऐसे में फ्लू जैसे लक्षणों को सामान्य वायरल बुखार समझकर इलाज में देरी करने से बचना चाहिए।

एक नजर में

• H1N1 इन्फ्लुएंजा को आमतौर पर स्वाइन फ्लू कहा जाता है

• संक्रमण के शुरुआती 48 घंटे उपचार के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं

• बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को विशेष सावधानी की जरूरत

• मधुमेह, हृदय, फेफड़े और किडनी की बीमारी वाले लोगों में जोखिम अधिक हो सकता है

• बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक लेना उचित नहीं

• सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द और होंठ या उंगलियों का नीला पड़ना गंभीर चेतावनी संकेत हैं

• फ्लू से बचाव के लिए हाथों की स्वच्छता और खांसते छींकते समय सावधानी जरूरी

• वार्षिक इन्फ्लुएंजा टीकाकरण गंभीर बीमारी के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है

क्या है H1N1 या स्वाइन फ्लू?

H1N1 इन्फ्लुएंजा सांस से जुड़ा संक्रामक संक्रमण है, जो Influenza A वायरस के कारण होता है। इसे स्वाइन फ्लू इसलिए कहा गया क्योंकि इसके शुरुआती संक्रमणों का संबंध सूअरों में पाए जाने वाले इन्फ्लुएंजा वायरस से था।

वर्ष 2009 में H1N1 संक्रमण के बड़े वैश्विक प्रकोप के बाद यह संक्रमण व्यापक चर्चा में आया। इसके बाद टीकाकरण और उपचार की मदद से इसके प्रभाव को नियंत्रित करने के प्रयास किए गए। हालांकि H1N1 आज भी मौसमी इन्फ्लुएंजा के रूप में सामने आ सकता है।

संक्रमण कैसे फैलता है?

H1N1 मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक श्वसन बूंदों के माध्यम से फैल सकता है। संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या बात करने के दौरान निकलने वाली बूंदें आसपास के लोगों तक पहुंच सकती हैं।

संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से भी संक्रमण फैलने का जोखिम रहता है। इसके अलावा संक्रमित सतहों को छूने के बाद आंख, नाक या मुंह को छूने से भी संक्रमण की संभावना हो सकती है।

इसीलिए भीड़भाड़ वाली जगहों पर सावधानी, हाथों की स्वच्छता और बीमार व्यक्ति से उचित दूरी बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

पहले 48 घंटे क्यों महत्वपूर्ण?

H1N1 जैसे इन्फ्लुएंजा संक्रमण में बीमारी की शुरुआत के बाद शुरुआती समय उपचार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। डॉ. दीप्ति मास्के के अनुसार, ओसेल्टामिविर जैसी एंटीवायरल दवाएं डॉक्टर की सलाह पर दी जा सकती हैं और बीमारी की अवधि तथा गंभीरता को कम करने में मदद कर सकती हैं।

विशेष रूप से गंभीर बीमारी के जोखिम वाले मरीजों में समय पर चिकित्सकीय मूल्यांकन और उपचार महत्वपूर्ण है।

हालांकि हर मरीज को एंटीवायरल दवा की जरूरत नहीं होती। दवा का निर्णय मरीज के लक्षण, जोखिम और चिकित्सकीय स्थिति के आधार पर डॉक्टर करते हैं।

सामान्य वायरल समझकर न करें नजरअंदाज

फ्लू के शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई दे सकते हैं। बुखार, खांसी, गले में खराश, कमजोरी और शरीर में दर्द जैसे लक्षण होने पर लोग अक्सर खुद से दवा लेना शुरू कर देते हैं।

यही स्थिति कई बार उपचार में देरी का कारण बन सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार लगातार बने रहने वाले या बढ़ते लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। खासकर ऐसे लोगों को अधिक सतर्क रहने की जरूरत है, जिन्हें पहले से मधुमेह, हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी, किडनी की बीमारी या प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने जैसी समस्या हो।

एंटीबायोटिक खुद से लेना नुकसानदायक

H1N1 एक वायरल संक्रमण है। इसलिए बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक लेना सही उपचार नहीं माना जाता।

एंटीबायोटिक का इस्तेमाल मुख्य रूप से बैक्टीरियल संक्रमणों के इलाज के लिए किया जाता है। बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेने से दवा प्रतिरोध यानी एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसी समस्या बढ़ सकती है।

इसलिए फ्लू जैसे लक्षण दिखाई देने पर खुद से एंटीबायोटिक लेने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

H1N1 संक्रमण के दौरान कुछ लक्षण गंभीर स्थिति का संकेत हो सकते हैं। इनमें शामिल हैं:

• सांस फूलना या सांस लेने में लगातार बढ़ती परेशानी

• तेज या कठिन सांस लेना

• सीने में दर्द

• होंठ या उंगलियों के सिरों का नीला पड़ना

• भ्रम या असमंजस की स्थिति

• अत्यधिक नींद आना या असामान्य सुस्ती

• खाना या पानी पीने में असमर्थ होना

• लगातार उल्टी होना

इनमें से कोई गंभीर लक्षण दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।

बच्चों और बुजुर्गों को ज्यादा सावधानी

H1N1 संक्रमण का जोखिम सभी लोगों में समान नहीं होता। बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी की जरूरत हो सकती है।

इसी तरह पहले से किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों में संक्रमण गंभीर रूप लेने की आशंका अधिक हो सकती है। ऐसे मरीजों में फ्लू जैसे लक्षण दिखाई देने पर चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।

बचाव के लिए इन बातों का रखें ध्यान

H1N1 संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए रोजमर्रा की कुछ सावधानियां महत्वपूर्ण हैं।

हाथों को साबुन और पानी से नियमित रूप से धोएं। भोजन करने से पहले, सार्वजनिक या साझा सतहों को छूने के बाद और बीमार व्यक्ति के संपर्क में आने के बाद हाथों की सफाई पर विशेष ध्यान दें।

खांसते या छींकते समय मुंह और नाक को टिश्यू या कोहनी से ढकें। फ्लू जैसे लक्षण होने पर दूसरों से उचित दूरी बनाए रखें और परिस्थितियों के अनुसार मास्क का इस्तेमाल करें।

बीमार होने पर खासकर बुजुर्गों, छोटे बच्चों और पहले से बीमार लोगों के संपर्क से बचना भी संक्रमण के प्रसार को कम करने में मदद कर सकता है।

टीकाकरण से गंभीर बीमारी का जोखिम कम हो सकता है

फ्लू से बचाव के लिए वार्षिक इन्फ्लुएंजा टीकाकरण एक महत्वपूर्ण उपाय हो सकता है। टीका संक्रमण के जोखिम को कम करने के साथ बीमारी होने की स्थिति में गंभीर लक्षणों के जोखिम को कम करने में भी मदद कर सकता है।

हालांकि टीकाकरण की जरूरत और उपयुक्तता व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और जोखिम कारकों के आधार पर तय की जाती है। इसके लिए डॉक्टर से सलाह लेना उचित है।

इलाज में देरी से बचना सबसे जरूरी

H1N1 संक्रमण में हर बुखार को स्वाइन फ्लू मानना सही नहीं है और न ही हर मरीज को एंटीवायरल दवा की जरूरत होती है। लेकिन फ्लू जैसे लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है।

खासकर जोखिम वाले समूहों में शुरुआती चिकित्सकीय सलाह महत्वपूर्ण है। लक्षणों की शुरुआत के बाद शुरुआती 48 घंटे उपचार के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

साफ सफाई, संक्रमित व्यक्ति से दूरी, खांसते छींकते समय सावधानी, टीकाकरण और समय पर चिकित्सकीय सलाह जैसे कदम संक्रमण से बचाव और गंभीर बीमारी के जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं।