बोधघाट बांध के लिए सर्वे शुरू, 56 गांवों पर विस्थापन का खतरा

बोधघाट बांध के लिए सर्वे शुरू, 56 गांवों पर विस्थापन का खतरा

जगदलपुर (चैनल इंडिया)। नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में दशकों से लंबित बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राज्य सरकार के निर्देश पर जल संसाधन विभाग ने इंद्रावती नदी पर बनने वाले इस प्रस्तावित बांध का सर्वे काम दोबारा शुरू कर दिया है। दंतेवाड़ा कलेक्टर देवेश ध्रुव ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि सर्वे को अगले सात से आठ महीनों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए विभिन्न एजेंसियों की टीमें लगातार क्षेत्र का दौरा कर रही हैं।
 इस फैसले ने स्थानीय आदिवासी समुदायों और पर्यावरणविदों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। बिना किसी ठोस पुनर्वास योजना और जानकारी के शुरू हुए इस सर्वे से बस्तर के गांवों में विस्थापन और अनिश्चितता का डर फैल गया है। बोधघाट परियोजना बस्तर की सबसे पुरानी नदी घाटी परियोजनाओं में से एक है, जिसकी परिकल्पना पहली बार 1979 की गई थी। 1984 में इसके लिए विश्व बैंक से कर्ज भी मंजूर हुआ था। 
नए प्रशासनिक अनुमानों के मुताबिक इस परियोजना के कारण बस्तर की अमूल्य प्राकृतिक संपदा और इंसानी बस्तियों को भारी नुकसान होगा। 56 गांव पूरी तरह या आंशिक रूप से डूब क्षेत्र में आ सकते हैं। 200 गांवों पर इस परियोजना का सीधा या परोक्ष असर पड़ेगा। 10,441 हेक्टेयर जमीन जलमग्न होगी, जिसमें 5,700 हेक्टेयर से अधिक घना जंगल शामिल है। इस वन क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा नेशनल पार्क के अंतर्गत आता है। ग्रामीणों का आरोप है कि इस साल मार्च में तेलंगाना की एक टीम ‘भारत सरकार लिखी गाडिय़ों में सडक़ और बाढ़ नियंत्रण के काम का बहाना बनाकर गुपचुप तरीके से सर्वे करने आई थी, जिसे विरोध के बाद वापस लौटना पड़ा।
कलेक्टर देवेश ध्रुव ने किसी भी बड़े विरोध की जानकारी से इनकार किया है। उनका कहना है कि यदि कुछ समूहों या लोगों की चिंताएं हैं, तो उन्हें उचित प्रक्रिया के माध्यम से सुलझाया जाएगा। प्रशासन का दावा है कि इस परियोजना से इंद्रावती बेसिन के चार जिलों के 236 गांवों की 3.78 लाख हेक्टेयर भूमि में सिंचाई, पेयजल और उद्योगों को पानी मिलेगा, जिससे अंतत: बस्तर का विकास होगा। बहरहाल, बिना भरोसे में लिए शुरू हुए इस सर्वे ने बस्तर में एक न जन-आंदोलन की जमीन तैयार कर दी है।
बोधघाट बांध परियोजना बस्तर के विकास और आदिवासी अस्तित्व के बीच एक गंभीर टकराव का रूप ले चुकी है। सिंचाई और बिजली के फायदे एक तरफ  हैं, लेकिन ग्राम सभाओं की अनदेखी, भारी पर्यावरण नुकसान और बिना पुनर्वास के 56 गांवों का विस्थापन इस महत्वाकांक्षी परियोजना को बड़े जन आंदोलन की ओर धकेल रहा है।
यह है योजना
बोधघाट छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग की एक प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसे इंद्रावती नदी पर बनाने की योजना है। इसका उद्देश्य बस्तर क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल और पनबिजली का उत्पादन करना है। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 30,000 करोड़ है। बिजली उत्पादन की शुरुआती क्षमता 125 मेगावाट है, जिसे 300 मेगावाट तक बढ़ाया जा सकता है। इंद्रावती बेसिन के चार जिलों के 236 गांवों की 3.78 लाख हेक्टेयर भूमि की इससे सिंचाई हो सकेगी। विस्थापन के बड़े संकट को देखते हुए 1987 में इसे पूरी तरह रोक दिया गया था। अब 2020 की नई रिपोर्ट के आधार पर इसे दोबारा शुरू किया जा रहा है।