बस्तर दशहरा में शामिल हजारों देवी-देवताओं को रसूम देकर विदाई

बस्तर दशहरा में शामिल हजारों  देवी-देवताओं को रसूम देकर विदाई

अबूझमाड़ के देवताओं ने भी बढ़ाई शोभा

जगदलपुर (चैनल इंडिया)। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की अनूठी परंपराओं में शामिल कुटुंब जात्रा की रस्म शनिवार को विधि-विधान के साथ निभाई गई। 75 दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक पर्व में शामिल होने संभाग के दूर-दराज के गांवों से पहुंचे हजारों देवी-देवताओं के छत्र, डोली और प्रतीकों को ससम्मान विदाई दी गई। 
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और दशहरा समिति की अगुवाई में आयोजित इस रस्म में परंपरा, आस्था और जनजातीय संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला। इस बार की कुटुंब जात्रा इसलिए भी खास रही, क्योंकि 200 से अधिक नए देवी-देवताओं ने बस्तर दशहरा में भाग लिया। इनमें इंद्रावती नदी के पार स्थित अबूझमाड़ क्षेत्र के देवी-देवता भी शामिल रहे।
 बस्तर दशहरा में कुटुंब जात्रा की रस्म का विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार, पर्व में शामिल होने के लिए संभाग के अलग-अलग गांवों के देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। दशहरा पर्व की समाप्ति पर उन्हें ससम्मान विदाई दी जाती है।

इसी परंपरा के तहत शनिवार को जगदलपुर के गंगामुंडा वार्ड स्थित देवगुड़ी में कुटुंब जात्रा की रस्म अदा की गई। इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और दशहरा समिति की ओर से देवी-देवताओं के छत्र और डोली लेकर पहुंचे पुजारियों को रसूम भेंट की गई। इसमें कपड़े, पैसे और मिठाइयां शामिल थीं। रियासतकाल से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाई जा रही है।

इस बार बस्तर दशहरा में 200 से अधिक नए देवी-देवताओं की भागीदारी आकर्षण का केंद्र रही। बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के अनुसार, इंद्रावती नदी के उस पार स्थित अबूझमाड़ क्षेत्र के देवी-देवता भी इस बार पर्व में शामिल हुए। बताया गया कि, नक्सलवाद के कारण पहले इस क्षेत्र के देवी-देवताओं का विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में पहुंच पाना मुश्किल होता था। हालांकि, इस बार वहां से बड़ी संख्या में देवी-देवता पर्व में शामिल हुए और कुटुंब जात्रा के दौरान उन्हें परंपरागत तरीके से विदाई दी गई। उनकी भागीदारी को बस्तर की सांस्कृतिक परंपराओं के विस्तार और आपसी जुड़ाव के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।