सावन में शिवपुराण श्रवण से मिटते हैं पाप,भगवान शिव की कृपा से मिलता है मोक्ष का मार्ग : इंदुभवानंद महाराज
श्री शंकराचार्य आश्रम में
चातुर्मास प्रवचनमाला का शुभारंभ,भक्तों ने सुना श्रावण मास की महिमा का विस्तृत वर्णन
रायपुर। श्री शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला रायपुर में ज्ञान की धारा बह रही है। आश्रम प्रमुख डॉ. इंदुभवानंद महाराज का द्वितीय चातुर्मास प्रारंभ हो गया है। श्रावण मास भगवान शिव की आराधना, भक्ति और आत्मशुद्धि का सर्वोत्तम अवसर है। इस पावन मास में श्रद्धापूर्वक शिवपुराण का श्रवण करने से मनुष्य के पापों का नाश होता है, अंत:करण निर्मल होता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भगवान शिव और भगवान विष्णु में कोई भेद नहीं है। भगवान विष्णु जहां पापों का हरण करते हैं, वहीं भगवान शिव पाप करने की वासना का भी अंत कर देते हैं। इसलिए शिवभक्ति और शिवपुराण का श्रवण मानव जीवन के कल्याण का सबसे सरल और श्रेष्ठ साधन है। यह उद्गार चातुर्मास धर्मसभा में डॉ. इंदुभवानंद महाराज ने व्यक्त किए।
महाराज जी ने कहा कि श्रावण मास का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इसकी पूर्णिमा श्रवण नक्षत्र में होती है। शास्त्रों के अनुसार जिस नक्षत्र में पूर्णिमा होती है, उसी के नाम से मास का नामकरण होता है। श्रवण नक्षत्र के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं और भगवान शिव ने अपने आराध्य भगवान विष्णु के प्रिय होने के कारण इस मास को विशेष रूप से स्वीकार किया। इसी कारण श्रावण मास भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।
हरि और हर में कोई अंतर नहीं
प्रवचन में महाराज जी ने कहा कि भगवान विष्णु 'हरि' हैं, जो मनुष्य के पापों का हरण करते हैं, जबकि भगवान शिव 'हर' हैं, जो मन में छिपी पाप करने की प्रवृत्ति और वासनाओं का भी नाश कर देते हैं। जब तक मन की वासनाएं समाप्त नहीं होतीं, तब तक पापों का जन्म होता रहेगा। जैसे वृक्ष की जड़ रहने तक अंकुर बार-बार निकलते रहते हैं, वैसे ही वासनाएं जीव को बार-बार पाप की ओर ले जाती हैं। भगवान शिव की कृपा से इन वासनाओं का भी अंत हो जाता है।
शिवपुराण भगवान शिव का ही स्वरूप
महाराज जी ने कहा कि शिवपुराण कोई सामान्य ग्रंथ नहीं, बल्कि भगवान शिव का साक्षात स्वरूप है। जिस प्रकार शिवलिंग के दर्शन से पुण्य प्राप्त होता है, उसी प्रकार शिवपुराण का श्रवण करने से भगवान शिव स्वयं शब्द रूप में भक्त के अंत:करण में प्रवेश करते हैं और उसके अज्ञान तथा पापों का नाश कर देते हैं।
महाराज जी ने कहा कि भगवान सूर्य बाहरी अंधकार को दूर करते हैं, लेकिन मनुष्य के हृदय में बसे अज्ञान रूपी अंधकार को केवल पुराणों का ज्ञान ही समाप्त करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को नियमित रूप से पुराणों का श्रवण करना चाहिए।
श्रावण में शिव कथा सुनना महायज्ञों के समान
कलियुग में बड़े-बड़े यज्ञ करना और कठिन तप करना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं है, लेकिन भगवान शिव की कथा सुनना अत्यंत सरल है। शिवपुराण का श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से राजसूय यज्ञ और अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। कथा सुनने में न धन की आवश्यकता होती है और न ही विशेष साधनों की। केवल श्रद्धा और एकाग्रता से कथा सुनने वाला व्यक्ति महान पुण्य का भागी बनता है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन शिवपुराण का श्रवण नहीं कर सकता तो कम से कम श्रावण मास में अवश्य कथा सुने। यदि अधिक समय न मिल सके तो एक मुहूर्त, आधा मुहूर्त या कुछ क्षण ही श्रद्धा से कथा सुन लेना भी अत्यंत फलदायी है।
सदाचार, भक्ति और विवेक का आधार है पुराण
प्रवचन के दौरान शौनक ऋषि और सूतजी के संवाद का उल्लेख करते हुए महाराज जी ने कहा कि पुराण मनुष्य को सदाचार, भक्ति और विवेक का मार्ग दिखाते हैं। केवल वेदों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है, यदि व्यक्ति का आचरण श्रेष्ठ नहीं है। संतों की संगति और भगवान की कथा से चरित्र का निर्माण होता है और जीवन में विवेक जागृत होता है।
उन्होंने कहा कि भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के समन्वय से विवेक उत्पन्न होता है और विवेक के माध्यम से मनुष्य संसार के मोह और बंधनों पर विजय प्राप्त कर सकता है।
शिव नाम और शिव कथा हैं कलियुग का कल्पवृक्ष
महाराज जी ने कहा कि कलियुग में भगवान शिव के नाम का संकीर्तन और शिवपुराण का श्रवण ही सबसे बड़ा साधन है। भगवान शिव का नाम और उनकी कथा कल्पवृक्ष के समान है, जो श्रद्धालु की समस्त शुभ कामनाओं को पूर्ण करती है। कथा श्रवण करने वाले का अंत:करण शुद्ध होता है, परिवार का कल्याण होता है और अंततः उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा कि अमृत पीने से केवल एक व्यक्ति अमर होता है, लेकिन भगवान शिव की कथा का अमृत जिस परिवार में पहुंचता है, वह संपूर्ण कुल के आध्यात्मिक कल्याण का कारण बनता है।
महाराज जी ने कहा कि श्रद्धालुओं से प्रतिदिन शिव नाम का स्मरण करने, श्रावण मास में भगवान शिव का जलाभिषेक करने तथा श्रद्धापूर्वक शिवपुराण का श्रवण करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भगवान शिव की कृपा से ही सच्ची भक्ति प्राप्त होती है और वही मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाती है।
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