शरीर के साथ मन का भी अभ्यास; योग में 'धारणा' और 'ध्यान' से मिलता है मानसिक संतुलन और आंतरिक शांति

शरीर के साथ मन का भी अभ्यास; योग में 'धारणा' और 'ध्यान' से मिलता है मानसिक संतुलन और आंतरिक शांति

रायपुर: आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में योग को अक्सर लोग केवल शारीरिक व्यायाम या विभिन्न आसनों तक ही सीमित मान लेते हैं, जबकि प्राचीन भारतीय योग परंपरा में यह शरीर के साथ-साथ मन को स्वस्थ, स्थिर और शांत रखने का भी संपूर्ण विज्ञान है। योग साधना में शरीर की फिटनेस के साथ मानसिक अनुशासन का विशेष महत्व है, जिसमें 'धारणा' (एकाग्रता) और 'ध्यान' (मेडिटेशन) आंतरिक शांति प्राप्त करने के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ माने गए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, धारणा का अर्थ मन को किसी एक बिंदु, विचार या वस्तु पर साधने का अभ्यास है। सामान्य स्थिति में हमारा मन लगातार अतीत की यादों या भविष्य की चिंताओं में भटकता रहता है, जिससे मानसिक तनाव बढ़ता है। धारणा इसी विचलित मन को एक निश्चित दिशा देने का कार्य करती है। इसमें अभ्यासकर्ता किसी जलते हुए दीपक की लौ, दोनों भौहों के मध्य भाग (आज्ञा चक्र) या किसी आराध्य को अपने ध्यान का केंद्र बनाते हैं। निरंतर अभ्यास से बिखरे हुए विचारों को समेटने की क्षमता विकसित होती है।

वहीं, 'ध्यान' की अवस्था धारणा का स्वाभाविक और अगला चरण है। जहां धारणा में मन को बार-बार एक विषय पर केंद्रित करना पड़ता है, वहीं ध्यान में चेतना का प्रवाह उसी विषय की ओर बिना किसी बाधा के लगातार बना रहता है। जब एकाग्रता गहरी और निरंतर हो जाती है, तो वही ध्यान का रूप ले लेती है। इन दोनों के नियमित अभ्यास से न केवल मानसिक संतुलन मजबूत होता है, बल्कि तनाव और अवसाद से भी प्रभावी ढंग से राहत मिलती है। किसी शांत वातावरण में श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण के साथ इसकी शुरुआत करके कोई भी व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा को आत्मसात कर सकता है।