भारतीय सीमाओं की 'तीसरी आंख' पर ग्रहण: इसरो का PSLV मिशन नाकाम, DRDO के सबसे एडवांस जासूसी सैटेलाइट की लॉन्चिंग विफल

भारतीय सीमाओं की 'तीसरी आंख' पर ग्रहण: इसरो का PSLV मिशन नाकाम, DRDO के सबसे एडवांस जासूसी सैटेलाइट की लॉन्चिंग विफल

श्रीहरिकोटा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के लिए साल 2026 की शुरुआत निराशाजनक रही। सोमवार सुबह श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया PSLV-C62 मिशन तकनीकी खराबी के कारण विफल हो गया। इस मिशन के जरिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित देश का सबसे एडवांस हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट 'अन्वेषा' (EOS-N1) अंतरिक्ष में भेजा जाना था, जो अपनी निर्धारित कक्षा (Orbit) तक नहीं पहुंच सका।

तीसरे चरण में आई बड़ी तकनीकी खराबी

सतीश धवन स्पेस सेंटर के प्रथम लॉन्च पैड से रॉकेट ने सुबह अपने निर्धारित समय पर उड़ान भरी। शुरुआती दो चरणों तक सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन असली समस्या तीसरे चरण (Third Stage) में आई।

इसरो प्रमुख ने मिशन की विफलता की पुष्टि करते हुए बताया, "रॉकेट के तीसरे चरण के दौरान प्रदर्शन में दिक्कत आई, जिससे रॉकेट की दिशा (Trajectory) बदल गई। वेग और दिशा में आए इस विचलन के कारण सैटेलाइट को सही कक्षा में स्थापित करना असंभव हो गया।"

क्यों खास था 'अन्वेषा' सैटेलाइट?

'अन्वेषा' (EOS-N1) कोई साधारण सैटेलाइट नहीं था। यह डीआरडीओ द्वारा विकसित एक हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट था। इसकी खासियतें इसे भारत की रक्षा प्रणाली के लिए बेहद अहम बनाती थीं:

  • एडवांस्ड इमेजिंग: यह जमीन पर मौजूद छोटी से छोटी वस्तुओं की हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें लेने में सक्षम था।

  • रक्षा उपयोग: इसका मुख्य उद्देश्य सामरिक निगरानी और संवेदनशील इलाकों पर नजर रखना था।

  • हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक: यह अदृश्य वर्णक्रम (Spectrums) के जरिए जमीन के नीचे के खनिज या छिपे हुए सैन्य ठिकानों की पहचान करने की क्षमता रखता था।

डेटा एनालिसिस में जुटे वैज्ञानिक

इस विफलता के बाद इसरो के कमांड सेंटर में सन्नाटा पसर गया। वर्तमान में इसरो के वैज्ञानिक रॉकेट से प्राप्त डेटा का गहन विश्लेषण कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तीसरे चरण के इंजन में प्रेशर की कमी या सेंसर में आई खराबी इस दुर्घटना का कारण हो सकती है।

इसरो प्रमुख ने आश्वस्त किया है कि इस विफलता के कारणों की बारीकी से जांच की जाएगी ताकि भविष्य के मिशनों, विशेष रूप से गगनयान और चंद्रयान सीरीज, पर इसका कोई असर न पड़े।

सफलता के बाद विफलता का स्वाद

पिछले कुछ वर्षों में इसरो ने लगातार कई सफल मिशनों के साथ विश्व स्तर पर अपनी साख बनाई है। ऐसे में 2026 के पहले ही मिशन का विफल होना अंतरिक्ष एजेंसी के लिए एक बड़ी चुनौती है। हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि अंतरिक्ष विज्ञान में विफलताएं सीखने का एक हिस्सा हैं और इसरो जल्द ही मजबूत वापसी करेगा।