रिश्वत के आरोप से 22 साल बाद मुक्त हुआ कर्मचारी! छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला, जानें क्या है 'डिमांड और रिकवरी' का नया नियम
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक पुराने मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक सरकारी कर्मचारी को 22 साल के लंबे इंतजार के बाद बाइज्जत बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत केवल आरोपी के पास से पैसे बरामद होना ही उसे दोषी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि रिश्वत की मांग (Demand) और उसे स्वीकार करने (Acceptance) के ठोस सबूत न हों।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला साल 2004 का है, जब आरोपी कर्मचारी के खिलाफ रिश्वत लेने के आरोप में ट्रैप की कार्रवाई की गई थी। आरोप था कि कर्मचारी ने किसी काम के बदले आर्थिक लाभ की मांग की थी। निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और बरामदगी के आधार पर कर्मचारी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
जस्टिस की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अभियोजन पक्ष के तर्कों में कई खामियां पाईं। कोर्ट ने रेखांकित किया कि:
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मांग का सबूत अनिवार्य: रिश्वत के मामले में यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने स्वेच्छा से पैसे मांगे थे। महज 'रिकवरी' (रकम की बरामदगी) को अपराध का पूर्ण प्रमाण नहीं माना जा सकता।
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संदेह का लाभ: यदि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहता है कि पैसा रिश्वत के तौर पर ही लिया गया था, तो आरोपी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।
22 साल की कानूनी लड़ाई का अंत
अदालत ने पाया कि इस केस में 'डिमांड और एक्सेप्टेंस' के पुख्ता सबूत पेश नहीं किए जा सके। ऐसे में निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया गया। 22 वर्षों तक चले इस कानूनी संघर्ष के बाद अब कर्मचारी को मानसिक और सामाजिक राहत मिली है।
भ्रष्टाचार के मामलों में नया नजीर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में एक नजीर (Precedent) बनेगा। यह आदेश स्पष्ट करता है कि किसी भी व्यक्ति को सजा देने के लिए केवल परिस्थितियों के आधार पर नहीं, बल्कि कानून के तय मानकों और प्रत्यक्ष प्रमाणों के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

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