"सौतेली मां सगी मां जैसा प्यार देगी, इसकी कोई गारंटी नहीं" : हाईकोर्ट

"सौतेली मां सगी मां जैसा प्यार देगी, इसकी कोई गारंटी नहीं" : हाईकोर्ट

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बच्चों की कस्टडी को लेकर एक अत्यंत भावुक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए केवल आर्थिक मजबूती ही काफी नहीं है, बल्कि मां का निस्वार्थ प्रेम और ममता सर्वोपरि है। हाईकोर्ट ने एक पिता की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि एक सौतेली मां बच्चे को वही स्नेह और माहौल दे पाएगी जो उसकी सगी मां दे रही है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला बेमेतरा जिले के कोड़वा निवासी लक्ष्मीकांत से जुड़ा है। लक्ष्मीकांत की शादी साल 2013 में हुई थी और उनके दो बेटे हैं। विवाद के चलते पत्नी अपने 7 साल के बेटे के साथ अलग रह रही है। पिता ने हाईकोर्ट में 'हैबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर कर बेटे की कस्टडी मांगी थी। पिता का मुख्य तर्क यह था कि उसकी आर्थिक स्थिति पत्नी से कहीं बेहतर है और वह बच्चे को अच्छी शिक्षा और सुख-सुविधाएं दे सकता है।

कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: पैसा ही सब कुछ नहीं

जस्टिस की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए पिता के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:

  • ममता का विकल्प नहीं: सौतेली मां बच्चे को सगी मां जैसा प्यार और मानसिक सुरक्षा देगी, इसका कोई भरोसा नहीं है।

  • कल्याण बनाम पैसा: बच्चे का हित केवल पिता की बेहतर कमाई या बैंक बैलेंस से तय नहीं होता, बल्कि उसके भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य से तय होता है।

  • दूसरी महिला का प्रभाव: कोर्ट ने पाया कि पिता किसी दूसरी महिला के साथ रह रहा है। ऐसे में बच्चे को उस माहौल में भेजना उसके भविष्य और विकास के लिए जोखिम भरा हो सकता है।

सगी मां की कस्टडी बरकरार

हाईकोर्ट ने माना कि बच्चा अपनी सगी मां के पास पूरी तरह सुरक्षित और खुश है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि मां के पास आय का जरिया न होना उसे बच्चे की कस्टडी से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता। पिता बच्चे के पालन-पोषण के लिए आर्थिक सहायता देने के लिए बाध्य है, लेकिन केवल पैसों के दम पर वह बच्चे को मां से अलग नहीं कर सकता।


लेख स्रोत: लल्लूराम डॉट कॉम और हाईकोर्ट के अदालती आदेश पर आधारित।

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