आदिवासी व अन्य परिवार आज भी दर-दर भटकने को मजबूर – Channelindia News
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आदिवासी व अन्य परिवार आज भी दर-दर भटकने को मजबूर

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वाड्रफनगर|  सरकार की महत्वपूर्ण  योजना में एक आदिवासियों को वन अधिकार पत्र प्रदाय करना , परंतु दुर्भाग्य यह है कि आदिवासी परिवारों के पास काबिज होने के बावजूद भी दस्तावेज न होने से वन अधिकार पत्र से उन्हें वंचित होना पड़ रहा है ऐसा ही वाक्य बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर विकासखंड अंतर्गत लगभग 7000  आवेदन फॉर्म जमा हुए हैं  जिनमें  से  समझने के लिए ग्राम पंचायत महेवा का लगभग 70 प्रकरण प्रस्तुत है जिनमें आदिवासी परिवार ,आजादी से पूर्व से उपरोक्त भूमि पर काबिज है उसके पास उस वक्त के दस्तावेज भी हैं परंतु अधिकारियों की माने तो नियम से बंधे हुए हैं।  आदिवासी परिवारों से जब चर्चा की गई तो उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज अंग्रेजों के समय से ही गांव में रह रहे हैं और गांव के गौटिया व पटेलों के यहां हरवाही का कार्य करते थे जो भी दस्तावेज हुआ करते थे वे गौटिया व पटेल के यहां जमा रहता था क्योंकि उस समय में रखने के लिए बक्से – पेटी की व्यवस्था नहीं थी साथ ही शिक्षा के स्तर ना के बराबर थी अनपढ़ होने के नाते उन्हें पता ही नहीं होता था कि कौन सा दस्तावेज किस काम का है वहीं कई मामलों में उन्होंने बताया कि उनके पूर्वजों के द्वारा वर्षों से जंगल को काटकर खेत बनाकर अपना भरण-पोषण करते आ रहे हैं|

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आप को बता दें की तब से लेकर अब तक  सरकार के द्वारा  उपरोक्त भूमि का  कब्जा प्रमाण पत्र  वितरण ही नहीं किया गया है ऐसे में  सरकार के द्वारा  मांगे जा रहे दस्तावेज  कैसे प्रस्तुत करें इन्हीं में से एक  आदिवासी दावेदार ने दिखाया कि उसके पिता आजादी के पहले सन् 1940 मे  स्कूल मे पढ़ाई किए थे जिसका दाखिला पंजी का छाया प्रति दिखाएं  जिसमें  उनके पिता रामप्रसाद  उपरोक्त गांव में आजादी से पूर्व निवासरत होने का प्रमाण दिखा रहे हैं  परंतु  जिस भूमि को उनके पूर्वजों ने जंगल झाड़ काटकर सफाई करके खेत बनाया है  उसे सरकार ने  1944 के सेटलमेंट रिकॉर्ड में  गोचर भूमि मद मे दर्ज कर दिया है जबकि मिसल रिकॉर्ड में वही भूमि में छोटे झाड़ मद में दर्ज है यही कारण है कि आजादी के इतने वर्ष बाद भी आदिवासी परिवार को अपने पूर्वजों के काबिज भूमि पर पट्टा प्राप्त करने की बजाय अतिक्रमण का दंश झेल रहा हैएवं उपरोक्त भूमि की पट्टे को लेकर बार-बार सरकार व प्रशासनिक अधिकारियों से गुहार लगा रहे हैं  परंतु अभी तक  उपरोक्त आदिवासी परिवार को  पट्टा मिल जाए यह कह पाना अभी भी मुश्किल होगा इसके अलावा कई और परिवार हैं जो  उपरोक्त भूमि पर काबिज हैं  अनुसूचित जाति वर्ग के हैं वे बिल्कुल भूमिहीन है और उस भूखंड के अलावा इन गरीब परिवारों के पास भूमि नहीं है साथ ही तीन पीढ़ियों का दस्तावेज भी नहीं है जमीनों में निवासकर  परिवार का गुजारा करते आ रहे हैं ऐसे में सरकार के द्वारा मांगे जा रहे हैं तीन पीढ़ियों का दस्तावेज वे कहां से लाएं और कैसे प्रस्तुत कर पाए यह चुनौती अधिकतर परिवारों के बीच देखने को मिल रही है ।80 वर्षीय सुनहरिया अगरिया आज भी उम्मीद लगाए बैठी है कि उसे वन अधिकार पट्टा मिलेगा और वह मरते वक्त चैन से मर पाएगीशासन की ओर से 7-8  परिवारों को प्रधानमंत्री आवास भी मिला हुआ है जो उपरोक्त गोचर भूमि पर ही बनाकर निवास कर रहे हैं|

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ग्राम पंचायत महेवा का वार्ड क्रमांक 1 का बसोरपारा व बाजार पारा पूरा गोचर भूमि पर ही निवासरत है| वहीं इस संबंध में वाड्रफनगर अनुविभागीय अधिकारी विशाल महाराणा ने बताया कि गोचर भूमि पर किसी भी तरह से वन अधिकार पत्र देने का प्रावधान नहीं है इसके लिए उच्च अधिकारियों के मार्गदर्शन से ही कार्रवाई की जा सकेगी।

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