वनांचल गांव रैनखोल के ग्रामीण प्रकृति के बीच कोविड से सुरक्षित कर रहे जीवन यापन … – Channelindia News
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वनांचल गांव रैनखोल के ग्रामीण प्रकृति के बीच कोविड से सुरक्षित कर रहे जीवन यापन …

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सक्ती के वनांचल गांवों में अब तक कोरोना संक्रमण के एक भी मामले नहीं आये सामने ….

सक्ती(चैनल इंडिया )। पूरे विश्व को महामारी से थर्रा देने वाले कोविड-19 के बीच एक अच्छी व सकारात्मक खबर यह है कि सक्ती विकासखण्ड के जंगलों के बीच पहाड़ की तलहटी पर बसे गांव रैनखोल जहां बड़ी तादात में पहाड़ी कोरवा जनजाति के लोग निवासरत है अब तक इस महामारी के चपेट में नहीं आये है और प्रकृति के बीच सुरक्षित तरीके से सामान्य जीवन यापन कर रहे है। जानकारी मुताबिक सक्ती वन परिक्षेत्र अंतर्गत रैनखोल, बरपाली, सलियाभांठा, गुंजी, जामचुंआ, नवागांव, जोबा, देवरी, भूंजी, नगरदा, सोनगुड़ा मसनिया, पनारी और बैलाचुंआ जैसे गांवों में कोविड संक्रमण के कोई संकेत अब तक नहीं मिले है। हालांकि ऐहतियातन तौर पर इन गांवों के लोग सुरक्षा के तमाम उपायों को भी अपना रहे है। ऐसे में माना जा रहा है कि प्रकृति के बीच भरपूर आक्सीजन के साथ जी रहे इन मेहनतकश आदिवासी समुदाय के लोगों तक अब तक बीमारी का संक्रमण इसीलिए नहीं हुआ है क्योंकि न तो ये आरामपंसद जीवन जी रहे है न ही बाहरी लोगों से इनका कोई संपर्क है। आज 21 वीं सदी में भी ये तमाम सुविधा संसाधनों से वंचित आदिम युग का जीवन जी रहे है और स्वस्थ्य तंदरूस्त है।

गौरतलब हो कि सक्ती विकासखण्ड का रैनखोल जो कि पहाड़ की तलहटी पर बसा हुआ है यहां की जनसंख्या तकरीबन 400 के आसपास है और यह ग्राम पंचायत ऋषभतीर्थ का आश्रित ग्राम है। यहां निवासरत पहाड़ी कोरवाओं को बुनियादी सुविधाएं आज भी पूरी तरह से नहीं मिल पा रही है। शासन की योजनाओं का लाभ लेने ये आज भी अधिकारियों, कार्यालयों का चक्कर लगाते देखे जाते है बावजूद कहीं इनकी सुनवाई नहीं होती है। हालांकि यहां निवासरत पहाड़ी कोरवा जनजाति प्राचीन रूढ़ीवादी परंपराओं से मुक्त नहीं हो पाए है। इनके निवास स्थानों पर बिजली, पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव आज भी बना हुआ है। शासन की योजनाओं का सही तरीके से उन्हें लाभ भी नहीं मिल पा रहा है। शुद्ध पेयजल की समस्या से भी इन्हें जूझना पड़ रहा है। दूषित पानी का सेवन करना इनकी मजबूरी है। यहां कोरवा जनजातियों को कई बार नलों से शुद्ध पेयजल भी नहीं मिल पाती जिससे वे ढोढ़ी, नाला का पानी पीने विवश है। हालांकि सरकार ने यहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सरकारी स्कूल आदि की सुविधा जरूर दी है किंतु यहां सुविधा संसाधन नाम मात्र का ही है।

 

पेड़ पौधें ही स्वस्थ्य जीवन का सहारा, कोरवा जनजाति से लेनी होगी सीख…

बहरहाल कोरोना काल के बीच मिल रहे इस सुखद समाचार के पीछे तथ्य यही है कि स्वस्थ्य जीवन के लिए हमें पेड़ पौधों के बीच रहना होगा, पर्याप्त मेहनत करना होगा साथ ही पर्यावरण का स्वच्छ रहना भी अनिवार्य है। इसके लिए हमारे आसपास पेड़ पौधे होना बेहद जरूरी है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। प्रशासन प्रतिवर्ष लाखों रुपये पौधे लगाने में खर्च कर रही है, लेकिन दूसरी ओर विकास कार्यों के नाम पर वर्षों पुराने लगे पेड़ों की कटाई की जा रही है। अगर समय रहते पेड़ों की कटाई पर रोक नहीं लगाई गई तो वनों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्ना हो जाएगा। वृक्षों के इस अंधाधुंध कटाई से जहां एक ओर वातावरण गर्म हो रहा है, वहीं प्रदूषण के कारण लोगों को श्वास, आंख, फेंफड़ा एवं अन्य बीमारियों से ग्रसित होना पड़ रहा है। हमें पर्यावरण को बचाने के लिए इन कोरवा जनजाति के लोगों से सीख लेने की जरूरत है।

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