पितृ मोक्ष अमावस्या सभी मठ मंदिरों  में पितर  तर्पण का पर्व, महंत राम सुंदर दास ने की पित्तरों  की विदाई – Channelindia News
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पितृ मोक्ष अमावस्या सभी मठ मंदिरों  में पितर  तर्पण का पर्व, महंत राम सुंदर दास ने की पित्तरों  की विदाई

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रायपुर | राजधानी रायपुर के मठपारा में स्थित श्री दूधाधारी मठ मंदिर में पितृ मोक्ष अमावस्या को पितर विसर्जन श्रद्धा- भक्ति पूर्वक किया गया इस अवसर पर पितरों को तर्पण के पश्चात आहुति प्रदान की गई। श्री दूधाधारी मठ रायपुर एवं इससे संबंधित सभी मठ मंदिरों में पितर पक्ष का त्यौहार पूरे एक पखवाड़े तक विधि पूर्वक मनाया गया प्रत्येक तिथि को अलग-अलग पूर्वाचार्यों को उनके गोलोक गमन तिथि के अनुसार तर्पण किया गया इसके लिए श्री दूधाधारी मठ पीठाधीश्वर राजेश्री डॉक्टर महन्त रामसुन्दर दास जी महाराज प्रत्येक दिन रायपुर स्थित खारून नदी के महादेव घाट में सुबह तर्पण के लिए उपस्थित हुए दशमी एवं एकादशी का श्राद्ध तर्पण उन्होंने शिवरीनारायण के महानदी की त्रिवेणी संगम तट पर किया। पितर तर्पण के संदर्भ में राजेश्री महन्त जी महाराज ने कहा कि सनातन धर्मावलंबियों में भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक पितर तर्पण करने की परंपरा है, ऐसी मान्यता है कि पितर देवता पितृ पक्ष में एक पखवाड़े तक पृथ्वी लोक पर आकर अपने वंशजों को अपने द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलते हुए देखकर बड़े प्रसन्न होते हैं, वे तर्पण के द्वारा तिलांजलि, आहुति आदि प्राप्त करके उन्हें उत्तम स्वास्थ्य एवं आरोग्य जीवन का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। मठ मंदिर में हम अपने उन पूर्वजों को तर्पण प्रदान करते हैं जो अब शरीर से हमारे बीच नहीं हैं, ब्रह्मलीन हो चुके हैं, उनके आदर्श एवं उज्जवल चरित्र आज भी हमारे सामने  विद्यमान हैं जो हमें अपने अतीत की गौरवशाली परंपरा का एहसास कराती है ।तर्पण के कार्यक्रम को संपन्न करने में कृष्णवल्लभ शर्मा जी ने पुरोहित के रूप में विशेष सहयोग प्रदान किया उन्होंने पितर पक्ष के संदर्भ में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि जो पुत्र वृद्धावस्था में माता-पिता की सेवा करते हैं और मरणोपरांत उनके निमित्त तर्पण करते हैं उन पर पितर देवता प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पितर मोक्ष के अवसर पर राजेश्री महन्त जी महाराज ने हर दिन की तरह खारून नदी में प्रातः काल उपस्थित होकर तर्पण किया। मठ मंदिर पहुंचकर उन्हें विधिवत आहुति प्रदान की एवं लोक कल्याण के लिए कामना की। यहां यह उल्लेखनीय है कि पाश्चात्य संस्कृति और भारतीय सनातन संस्कृति में विशेष अंतर है, जहां एक ओर पाश्चात्य संस्कृति भौतिकता वाद के उपभोग वादी जीवन पद्धति पर आधारित है वही भारतीय संस्कृति का प्रत्येक परंपरा आध्यात्मिकता से ओतप्रोत है यहां जीवन के हर एक कार्य आध्यात्मिक उन्नति से जुड़ा हुआ है मृत्यु के पश्चात भी आत्मा की उन्नति की कामना करना केवल भारतीय संस्कृति में ही देखने को मिलता होता है इसीलिए यह विश्व की अद्भुत एवं अलौकिक धर्म है जिसका अनुसरण न केवल भारत में अपितु विश्व के अनेक भागों में सनातन धर्मावलंबी परंपरागत रूप से करते आ रहे हैं।

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