कानून के विद्वान अधिवक्ता की संकीर्ण मानसिकता, मीडिया पर किया घृणित शब्दों से प्रहार… – Channelindia News
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कानून के विद्वान अधिवक्ता की संकीर्ण मानसिकता, मीडिया पर किया घृणित शब्दों से प्रहार…

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चिरमिरी(चैनल इंडिया)|  इन दिनों सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आरोप प्रत्यारोप एवं लांक्षन लगाने का कार्य निरंतर जारी है। सोशल मीडिया पर अक्सर यह देखने में आ रहा है कि लोग अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अपने विचारों को खुल कर लिखने लगे हैं। जो कि एक बहुत ही अच्छी बात है। किंतु लोग यह भूल जाते हैं कि जहां संविधान ने लोगों को अधिकार दिए हैं वहीं लोगों के लिए कर्तव्यों का निर्वहन भी अनिवार्य किया गया है।

देखने में यह आ रहा है कि सोशल मीडिया पर पार्टी के पक्ष या विपक्ष में, धर्म के पक्ष या विपक्ष में लोग अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का प्रयोग करते हुए अपने कर्तव्यों को भूल स्तरहीन भाषा का प्रयोग करने लगते हैं। और यह अभिव्यक्ति की आजादी स्तरहीन गाली गलौज तक पहुंच जाती है।

प्रायः ऐसे प्रहार राजनीति में होते ही रहते हैं। किंतु राजनीति से इतर सब पर समन्वक दृष्टि रखने वाले लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर स्तरहीन शब्दों के साथ ऐसा घृणित प्रहार क्या उचित है??

तस्वीर में आप देख सकते हैं कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर किन शब्दों के साथ और कैसी टिप्पणी की गई है। सूत्र बताते हैं कि इस पोस्ट को सोशल मीडिया पर जिस व्यक्ति द्वारा लगाया है वो पेशे से वकील हैं। भारत में वकीलों को विद्वानों की श्रेणी में रखा गया है। यह कैसी विद्वता का परिचय सोशल मीडिया जैसे सार्वजनिक मंच पर एक दिया जा रहा है। क्या पेशे से एक विद्वान वकील द्वारा लोकतंत्र के चौथे स्वतंत्र स्तंभ पर इस तरह से स्तरहीन शब्दों के साथ प्रहार उचित है? क्या ऐसे शब्दों का प्रयोग किसी विद्वान वकील द्वारा किया जाना चाहिए??

कोरोना काल में कितने ही पत्रकारों ने जनता के बीच जाकर जनता के लिए जान दी। कितने ही मीडिया कर्मियों ने अपनी जान खोयी। विषम परिस्थितियों में भी मीडिया कर्मियों ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन निष्पक्ष रह कर किया। ऐसे में मीडिया पर इस तरह के स्तरहीन शब्दों के साथ प्रहार कहां से उचित है। शासन प्रशासन क्यों इस तरह के वक्तव्यों पर स्वयं संज्ञान नहीं लेती।

स्तरहीन शब्दों के साथ लोकतंत्र के चौथे स्वतंत्र स्तंभ पर यह प्रहार कदापि न्यायोचित नहीं।

ऐसे स्तरहीन शब्द कहीं से भी किसी विद्वान व्यक्ति के नहीं हो सकते एवं ना ही कोई विद्वान व्यक्ति ऐसे घृणित शब्दों का समर्थन करेगा।

जब इन शब्दों के संबंध में टीम ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं एवं वरिष्ठ पत्रकारों से बात की तो उन्होंने कहा कि अवश्य ही पोस्ट लिखने वाले की मानसिक स्थिति सही नहीं या फिर मानसिकता सही नहीं। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि एक अधिवक्ता का कार्य माननीय न्यायालय के अंदर प्रारंभ होता है। माननीय न्यायालय से बाहर इस तरह की टिप्पणी राजनीति से प्रेरित उक्त अधिवक्ता की संकीर्ण मानसिकता को प्रदर्शित करता है।

सवाल फिर वही कि क्या संविधान किन घृणित शब्दों के साथ चौथे स्तंभ पर ऐसे प्रहार की इजाजत देता है। अगर नहीं तो प्रशासन स्वतः संज्ञान लेते हुए ऐसे घृणित शब्दों के साथ लोकतंत्र के चौथे स्वतंत्र स्तंभ पर प्रहार करने वाले व्यक्तियों पर क्यों कार्यवाही नहीं कर रहा।

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