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जाने रेप होने का प्रमाण,कैसे लगाया जाता है पता,और कितने घंटे मे मिल जाता है मेडिकल रिपोर्ट



रेप के बाद होने वाले हर उतार चढ़ाव का एक एक पल कीमती होता है जिस पर डॉ मलिक के मुताबिक पीड़िता का सैंपल 11 दिनों बाद लिया गया, जबकि सरकारी गाइडलाइन के मुताबिक रेप की शिकायत पर पीड़िता का सैंपल सिर्फ 96 घंटों के भीतर ही लिया जाना चाहिए, तभी सही रिपोर्ट आती है. कुल मिलाकर डॉ मलिक के अनुसार अब जो सैंपल मिले हैं, उनके किसी रेप की पुष्टि नहीं हो सकती है क्योंकि काफी देर हो चुकी.

सैंपल के तौर पर पीड़िता के बालों, कपड़ों, नाखूनों, वजाइना और गुदाद्वार से सैंपल लिए जाते हैं. इस दौरान ये जांच होती है कि क्या इन जगहों पर या ऑब्जेक्ट्स में स्पर्म मिल रहा है. ये जांच तभी सही होती है, जब जल्दी से जल्दी की जाए. इसमें देर होने पर यूरिनेशन, मल विसर्जन या पीरियड्स के आने के कारण स्पर्म हट जाते हैं और रिपोर्ट प्रभावित होती है.

फॉरेंसिक रिसर्च एंड क्रिमिनोलॉजी इंटरनेशनल नामक साइंस जर्नल में इस बारे में बताया गया है कि किन तरीकों से जांच करके अंतिम निर्णय लिया जाता है. रेप की पुष्टि के लिए पीड़िता के बयान के अलावा मेडिकल साक्ष्यों का भी काफी महत्व है. इसके तहत पीड़िता के कपड़ों की फॉरेंसिक जांच होती है और देखा जाता है कि क्या इसमें सीमन या खून या पसीने के कोई प्रमाण हैं|

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रेप की दशा में पीड़िता के नाखून भी तह तक पहुंचने में मदद करते हैं| इनमें सीमन सैंपल या फिर अपराधी की स्किन पार्टिकल हो सकते हैं, जिनके जरिए डीएनए जांच हो सकती है. इसके अलावा पीड़िता की स्किन पर सलाइवा, पसीना या फिर स्पर्म की जांच के लिए भी सैंपल लेने की कोशिश की जाती है. हालांकि इन सारे ही सैंपल को जमा करने का एक खास तरीका होता है और साथ ही साथ ये टाइम-बाउंड भी होते हैं.

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बताया जाता है,कि रेप करने के तरीकों के साथ भी इसके सैंपल की जांच का समय प्रभावित होता है. अगर पीड़िता के मुंह में रेपिस्ट ने यौनांग डाला हो, तब ओरल स्वाब टेस्ट होता है. ये रेप के 12 से 24 घंटों के भीतर होना चाहिए, वरना नतीजों पर असर पड़ सकता है. ऐसे ही अगर वजाइना में यौनांग डाला जाए तो 3 से 5 दिनों के भीतर सैंपल दिया ही जाना चाहिए वरना इसके नतीजे सही नहीं आते. कई बार अगर पीड़िता के पीरियड्स हो रहे हों या फिर वो मूत्राशय के किसी रोग से पीड़ित हो तो सैंपल 24 घंटों के भीतर लिया जाना जरूरी होता है वरना प्रामाणिक नतीजे नहीं मिलते क्योंकि स्पर्म यूटेराइन कैविटी (गर्भाशय छिद्र) से हट जाते हैं.

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कपड़ों, नाखून और बालों के अलावा कई और सैंपल भी लिए जाते हैं. जैसे अगर पीड़िता का तब पीरियड चल रहा हो तो उसका टैंपून या पैड भी एक अहम साक्ष्य होता है. एक तरीका पब्लिक हेयर कॉबिंग भी है. इसमें साफ सरफेस पर पीड़िता की कंघी की जाती है ताकि अगर कोई फॉरेन आब्जेक्ट हो तो पता लगे.