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जानिए क्या है पृथ्वी का ऊर्जा बजट और कितना खतरनाक है इसका असंतुलन, पढ़ें पूरी खबर…

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हाल ही में संयुक्त राष्ट्र में IPCC ने अपनी रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन (Climate change) की बहुत चिंताजनक तस्वीर पेश की है. इस रिपोर्ट में बताई गई बातों पर जानकारों को हैरानी नहीं हुई है क्योंकि विशेषज्ञ बहुत पहले से ही इस तरह की चेतावनी देते रहे हैं. जलवायु परिवर्तन का असर पृथ्वी (Earth) के अपने ऊर्जा प्रबंधन पर पड़ा है. पृथ्वी पर अधिकांश ऊर्जा सूर्य से आती है और इसी ऊर्जा का पृथ्वी के पर्यावरण और जीवों पर सबसे ज्यादा असर होता है. लेकिन जलवायु परिवर्तन से उसकी ऊर्जा बहाव में बदलाव हुआ है और ऊर्जा बजट (Energy Budget) असंतुलित हो गया है.

ऊर्जा के रूप बदलने का खेल
ऊर्जा ना तो पैदा की जा सकती है ना ही उसे नष्ट किया जा सकता है लेकिन उसके रूप में बदलाव होता रहा है.पृथ्वी पर ऊर्जा का बहाव भी इस बदालव की वजह से होता है और यही बहाव (Energy Flow) पृथ्वी की अधिकांश प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है जिसमें यहां का जीवन प्रमुख है.

क्या होता है पृथ्वी का ऊर्जा बजट
जब सूर्यकी किरणें पृथ्वी पर पहुंचती हैं तो सबसे पहले वहां यहां मौजूद अणुओं में ऊर्जा प्रदान कर उन्हें गति प्रदान करती हैं. इसी को इंसान गर्मी के रूप में महसूस करता है. इसके साथ ही पृथ्वी और उसके वायुमंडल से भी ऊर्जा वापस अंतरिक्ष में भी जाती रहती है. इसी ऊर्जा के आमगन और निर्गमन के संतुलन को पृथ्वी का ऊर्जा बजट कहते हैं.

ऊर्जा बहाव से जलवायु का निर्धारण
हमारी दुनिया की जलवायु भी इन्ही ऊर्जा बहावों से निर्धारित होती है. जब पृथ्वी पर आने वाली ऊर्जा उससे बाहर जाने वाली ऊर्जा से अधिक होती है तो हमारा ग्रह गर्म होने लगता है. ऐसा कई तरह से हो सकता है जैसे जब महासागरों की बर्फ, जो सामान्यता सौर विकिरण को प्रतिबिंबित करती है, गायब होने लगती है और गहरे रंग के महागासर ऊर्जा अवशोषित करने लगते हैं.

बरसों से मापा जा रहा है ऊर्जा बजट
इसके अलावा ग्रीन हाउस गैसें भी वायुमंडल से अंतरिक्ष की ओर बाहर निकलती हुई ऊर्जा को अवशोषित कर लेती हैं. कन्वर्शेसन में प्रकाशित इस अध्ययन के शोधकर्ता स्कॉट डेनिंग के लेख में उन्होंने बताया कि उनके जैसे वैज्ञानिक साल 1980 से पृथ्वी के ऊर्जा बजट का मापन करते आ रहे हैं. इसके लिए उन्होंने सैटेलाइट, हवाई जहाजों और महासागरों में घूमते जहाजों और जमीन पर लगे उपकरणों की मदद ली. पृथ्वी की ऊर्जा बजट इस साल को IPCC की जारी रिपोर्ट का भी अहम हिस्सा है.

कितनी ऊर्जा आती है पृथ्वी पर सूर्य से
पृथ्वी पर चलने वाले जलवायु तंत्रों को चालाने वाली लगभग सारी ऊर्जा सूर्य से ही आती है. केवल कुछ मात्रा की ऊर्जा पृथ्वी के आंतरिक भाग से आती है. औसतन पृथ्वी 340.5 वाट प्रतिमीटर की सूर्य की रोशनी हासिल करती है. यह सारी ऊर्जा दिन के समय पर पृथ्वी पर आती है और स्थानीय दोपहर को यह सबसे ज्यादा आती है. इस ऊर्जा में 99.9 वाट बादल, धूल और बर्फ अंतरिक्ष में प्रतिबिंबित कर वापस भेज देते हैं.

वापस नहीं जा पाता पूरा हिस्सा
बची हुई 240.5 वाट की ऊर्जा का एक चौथाई वायुमडंल अवशोषित कर लेता है और बाकी पृथ्वी की सतह अवशोषित कर लेती है. यह विकिरण पृथ्वी के लिए ऊष्मा ऊर्जा में बदल जाता है. यह अवशोषित ऊर्जा पूरी की पूरी ही अंतरिक्ष में उत्सर्जित हो जाती है. लेकिन अब इसमें से कुछ हिस्सा ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जमा होता जा रहा है. यह हिस्सा पिछली सदी के 0.6 वाट प्रति वर्ग मीटर से बढ़ कर 2006-2018 के बीच 0.79 तक पहुंच गया है. इसमें से ज्यादतर हिस्सा महासागरों को गर्म कर रहा है.

इसके लिए वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा का बढ़ना है जो सूर्य की किरणों के लिए तो पारदर्शी हैं लेकिन पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित इंफ्रारेड विकिरण के लिए नहीं. इसी वजह से ऊर्जा वायुमंडल में जमा होने लगती है. CO2 की मात्रा दोगुनी भर हो जाने से वह पृथ्वी पर 3.7 वाट प्रतिवर्ग की ऊष्मा जोड़ने लगेगी. वर्तमान प्रदूषण की दर CO2 की मात्रा साल 2050 तक ही दोगुना कर देगी जिससे दुनिया का तापमान 3 डिग्री तक बढ़ जाएगा.


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