जोर पकड़ रही आदिवासियों के अलग बस्तर राज्य की मांग – Channelindia News
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जोर पकड़ रही आदिवासियों के अलग बस्तर राज्य की मांग

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भारत मे समय समय पर नये राज्यों की मांग उठती रहती है। देश मे कोई भी नए राज्यो और क्षेत्रो के निर्माण का अधिकार पूरी तरह से भारत की संसद के पास है। संसद नए राज्यो की घोषणा करके, किसी राज्य से एक क्षेत्र को अलग करके, या दो या उससे से अधिक राज्यो या उसके हिस्सो मे विलय करके नये राज्य का गठन कर सकती है। वर्तमान मे मौजूदा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अलावा समय के साथ इंडिया में कई नए राज्यो और क्षेत्रो को स्थापित करने का प्रस्ताव रखा जाता रहा है। आजादी के बाद कई क्षेत्रो को भाषा व भौगोलिकता के आधार पर स्वतंत्र राज्य की पहचान दी गई पर आदिवासी समुदाय के साथ अन्याय हुआ, जिससे देश मे अलग अलग राज्यों मे बसे विभिन्न आदिवासी समुदाय भी अपनी सांस्कृतिक पहचान, अधिकार व अस्तित्व को बरकरार रखने के लिये समय समय पर अपने स्वतंत्र राज्यों की मांग उठाते रहे है।

आदिवासी समुदाय ने कभी गुलामी स्वीकार नही की उसका प्रमाण आप समय समय पर उनके द्रारा अन्याय, शोषण के खिलाफ आवाज व उठाये गए स्वतंत्र प्रदेश, राज्य की मांग व उसके लिये देश व बाहरी ताकतों से किये गये उनके संघर्ष से जान सकते है। इंडिया मे वर्तमान मे भी राजस्थान मे मीणा आदिवासीयो द्रारा मत्स्य प्रदेश, असम मे बोडो आदिवासीयो द्रारा बोडोलेंड और कार्बी आदिवासीयो की कार्बी आंगलोंग की मांग, मणिपुर के कूकी आदिवासीयो द्रारा कूकिलेंड की मांग, मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी घाटी के ऊपरी या पूर्वी इलाकों में बसे गोंड आदिवासीयो की गोंडवाना स्टेट की मांग, पश्विम बंगाल मे गोरखालेंड के लीये उठ रही आवाज जैसे कई आदिवासी अपने स्वतंत्र राज्य की मांग कर रहे है। जिनमे से ऐक है मध्य -दक्षिण भारत के आदिवासीयो द्रारा की जा रही स्वतंत्र बस्तर को अलग राज्य की मांग कर रहे हैं।

बस्तर राज्य की सामान्य जानकारी

आजादी से पूर्व ब्रिटिश काल में बस्तर गोदावरी संभाग के अंतर्गत सन 1885 में जिला बनाया गया था।  स्वतंत्रता उपरांत सन 1948 को बस्तर रियासत एवं कांकेर रियासत को मिलाकर मध्य प्रांत के अंतर्गत नवीन बस्तर जिले का गठन किया गया था। 20 मार्च 1981 को बस्तर क्षेत्र अविभाजित मध्यप्रदेश का नवीन संभाग बनाया गया । देश के सबसे बड़े बस्तर  जिले   का प्रथम विभाजन दो  5 मई 1998 को हुआ और बस्तर जिले के तीन भागों में विभाजित कर दिया गया । बस्तर जिले का उत्तरी भाग उत्तर बस्तर कांकेर जिले के रूप में एवं दक्षिण भाग दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा जिले के नाम से एवं मध्य भाग बस्तर जिला के नाम से गठित हुआ। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना के बाद वर्तमान में बस्तर संभाग के अंतर्गत सात जिलों 32 विकासखंड तथा 12 विधानसभा क्षेत्र 2 लोकसभा क्षेत्र आता है।

बस्तर की रत्नागर्भा धरा अनमोल है, जिसने अपने हृदय के अंदर लोहा, बॉक्साइट , टिन, कोरंडम,  अभ्रक एवं अन्य बहुमूल्य प्रचुर खनिज संपदाओं संजोय कर रखती है। दंतेवाड़ा जिले में स्थित बैलाडीला लौह अयस्क की खदान विश्व की सबसे बड़ी लोह अयस्क खदानों में से एक है, जहां से लोहा अयस्क जापान को निर्यात किया जाता है । बस्तर संभाग के सुकमा जिले से भारत का लगभग 95.5% टिन अयस्क  प्राप्त होता है । बस्तर के  ह्र्दय के अपार वन संपदा का श्रृंखला है , जिसमें  सागौन , साल ,महुआ , बीजा , सरगी आदि अनेक वृक्ष पाए जाते हैं ।बस्तर का लगभग 55% क्षेत्र वनाच्छीदित हैं ।बस्तर के दो प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान , दो वन अभ्यारण हैं ।1985 में कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान को एशिया का प्रथम बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया गया।  बस्तर की जलवायु समशीतोष्ण है यहां का अधिकतम तापमान औसत 40 डिग्री सेंटीग्रेट एवं न्यूनतम तापमान 11 डिग्री सेंटीग्रेट पाया जाता है । बस्तर में उपजाऊ भूमि का अभाव है,  यहां प्रमुख रुप से लाल पीली- मिट्टियां पाई जाती है । राज्य में सर्वाधिक बाजरा एवं कोदो – कुटकी की फसल  बस्तर संभाग में पैदा होती है ।बस्तर की प्रमुख उपज धान, मक्का, कोदो-  कुटकी, कुलती ,हरहर है । बस्तर क्षेत्र में 3 नीति निम्नलिखित आई क्षेत्र अतिनिम्न सिंचित क्षेत्र होने के कारण कृषि उत्पादन कार्य में अत्यधिक पिछड़ा है । बस्तर परियोजना गोदावरी अपवाह तंत्र के अंतर्गत आता है। इस अपवाह तंत्र की प्रमुख नदियां इंद्रावती, सबरी  है।  बस्तर की गंगा इंद्रावती नदी अपनी 30 सहायक नदीयो के साथ बस्तर की 264 किलोमीटर की दूरी की लंबाई  तय करती है ।बस्तर का अद्भुत नैसर्गिक सौंदर्य एवं समुद्र पुरातत्व पर्यटन के मनभावन का केंद्र है,  यहां पर बारसूर नगरी , मां दंतेश्वरी का पवित्र स्थल,  मनोहारी चित्रकोट , तीरथगढ़, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान व अन्य प्राकृतिक सौंदर्य में  सुगन्ध सुववासित कर देते हैं।बस्तर का जनजीवन और उनका प्राचीन परंपरावादी प्रवाह अपनी सांस्कृतिक जीवन  की अविरलता अक्षुण बनाये हैं । बस्तर प्रमुखत: लोक संस्कृति का संवाहक परी क्षेत्र है,  जहां आज भी पुरातन संस्कृतिया ,  अटखेलियां  करती  है। प्रमुख रूप से यहां पर गोंड , मुरिया, माड़िया , धुरवा , भतरा ,हल्बा , दोरला , परजा  अन्य लगभग 20 से अधिक जन जातियों निवास करती हैं ,वे अपनी संस्कृति प्राचीन अस्मिता को बनाए हुए हैं । बस्तर क्षेत्र के प्रमुख लोकपर्व , बस्तर दसरहा ,  गोंचा पर्व,  माटी तिहार, अमुस तिहार,  नवा खानी, चूरु , दियारी  , जतरा , भीमा नाच , पूसकोलेंग , लेजा , ककरसाड़ , चैत परब  मेला मड़ई आदि हैं।बस्तर में शिक्षा का समुचित विकास अभी भी धीमी गति है , बस्तर परिक्षेत्र में सर्वप्रथम 1886 स्कूली शिक्षा की सुरुआत हुई थी,  वही प्रथम शासकीय महाविद्यालय की स्थापना 1962 में जगदलपुर में हुई थी।  संभाग का प्रथम विश्वविद्यालय शहीद महेंद्र शर्मा विश्वविद्यालय 2008 में जगदलपुर में स्थापना हुआ था। बस्तर संभाग की साक्षरता प्रतिशत न्यूनतम हैं बस्तर क्षेत्र में जनसंख्या घनत्व अधिक विरल है ।बस्तर का आम आदिवासी वस्तुतः विकास के नवीनतम पथ पर भी अपनी पुरातन संस्कृति के परंपरागत  परिवेश में  रीलो -लेजा , झालीआना , कोटनी गीत, हुलकी , मादरी , डंडार , नगाड़ा , बाजा , मोहरी , तुड़बुड़ी  मोहरी के धुनों  फारसी और जोदरी मुर्गा लड़ाता है,  तरपनी, सल्फी , महुआ रस और लान्दा  में मस्त,  सदियों पुराने बनाए दस्तूरों के एक-एक शब्द को भी जी रहा हैं।

-भौगोलिक क्षेत्रफल 39,114 वर्ग कि.मी.

-उत्तर से दक्षिण तक की लंबाई 290 कि.मी.

-पूर्व से पश्चिम तक चौड़ाई 200 कि.मी.

क्यों उठ रही है मांग ? 

1.आजादी के 70 साल बित जाने बाद भी अब तक ठीक से ५ वी अनुसूची की धरातलीय अमलावारी नही हुई।

2.वन अधिकार कानून 2006 के तहत आदिवासीयो के कानूनी अधिकार सदियों से वनों मे व आसपास बसने वाले आदिवासीयो को नही मिले। शासन – प्रशासन द्रारा इसकी अनुपालना न कर अवहेलना की जाती रही है।

संविधान मे भी राष्ट्रपति व राज्यपाल को सत्ता दी गई है की आदिवासीयो की स्थिति व विकास के बारे मे वार्षिक रिपोर्ट पेश कर उचित संशोधन के जरिये कदम उठाये, लेकिन आज तक उनकी और से भी आदिवासी समुदाय को कही न कही उपेक्षा का सामना करना पड रहा है।

4.आदिवासी क्षेत्रो मे अनुच्छेद 244(1) का उल्लंघन कर पुलिस बल दल के साथ जोर जबरजस्ती से  आदिवासीयो की भूमि अधिग्रहण करने का कार्य शासन प्रशासन कर रहा है।

NMDC  के द्वारा इस्लेरी पाईप लाइन आदिवासीयो की भूमि हडपी जा रही है।

सदियो से वनो के निकट रहे आदिवासीयो को वन विभाग द्रारा उनके घर तोड़ कर उन्हे प्रताड़ित किया जा रहा हे, उनकी फसलो पर बुलडोजर चलाया जा रहा है।

अन्याय, शोषण के खिलाफ आवाज उठा रहे, अपने अधिकारों की लड़ाई लड रहे शांतिपूर्ण जीवनशेली के आदि रहे आदिवासीयो पर पुलिसिया प्रसासन द्रारा तथ्यविहीन आरोप-प्रत्यारोप लगाकर जूठे मुकदमे दर्ज कर उन्हे अशांत करने का प्रयास किया जाता रहा है।

8.आदिवासियों के जमीन को छीनकर केम्प खोलने के नाम आदिवासीयो से जमीन छीन लिया गया।

9.आदिवासीयो के पारम्परिक धार्मिक देव –  पुरखा के पवित्र स्थानों को छिनकर उनको अपभ्रंस कर अन्य धर्म व पर्यटनीय स्थानों के तौर पर घोषित कर दिया गया व उनकी आस्था को ठेस पहुंचाने का कार्य किया गया।

सरकार द्रारा आजादी के सात दशक बित जाने के बाद भी इन आदिवासी क्षेत्रो मे शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल जेसी मुलभुत सुविधाओ का सकारात्मक अमलीकरण नही कर दरिद्रता, बिमारी, बेसहारा, परनिर्भरता की और जबरजस्ती धकेला जा रहा है।

सिर्फ पर्यटन हेतु या सरकारो के आपसी मतभेद के कारण आदिवासी क्षेत्रो की बड़ी नदियों के बाँध का पानी का बहाव रोक या बहाव की उंचाई बढाकर गाँवों के गांव उजाड़े गए।

.आदिवासी बजट का अन्य कार्यो मे खर्च, आदिवासीयो के अधिकार अन्य जातियो को देना, उनकी मूलभूत सुविधाओं को अनदेखा करना।

आदिवासी क्षेत्रो मे गैर आदिवासीयो के हाथो मे उद्योग रोजगार की कमान होने की वजह से वो श्रमिक बनकर रह गये, कम शिक्षा की वजह से उनके साथ लूटपाट व शोषण होता रहा है।

.सुकमा के ग्राम – सिलगेर में शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे निर्दोष ग्रामीणों के उपर अंधाधुंध गोलीबारी करने वालों के विरूद्ध एफआईआर दर्ज कर परिवार को न्याय प्रदाय किया जाऐ एवं मृतक के परिजन को 50 लाख और घायलों को 5 लाख एवं मृतक परिवार के एक सदस्य को योग्यतानुसार शासकीय नौकरी के मांग पर सरकार कोई अमल नहीं  ।

बस्तर संभाग की नक्सल समस्या पर स्थायी समाधान हेतु सभी पक्षों से समन्वय स्थापित कर स्थाई समाधान की ओर राज्य सरकार द्वारा शीघ्र पहल करें इसमें कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नही ।

पदोन्नति में आरक्षण के संबंध में जब तक माननीय उच्च न्यायालय के स्थगन समाप्त नहीं हो जाता तब तक किसी भी हालत में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पदोन्नत रिक्त पदों को नहीं भरे जाने , उसे सुरक्षित रखे जाने और जितने सामान्य वर्ग के अधिकारी / कर्मचारी अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पदों पर नियम विरूद्ध पदोन्नत हुए उसे तत्काल पदावनत किया जाकर पदोन्नति नियम 2003 एवं आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 06 नियम 1998 एवं समय – समय पर जारी निर्देशों का उल्लंघन कर नियम विरूद्ध पदोन्नति देने वाले अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही एवं धारा 6 आरक्षण अधिनियम 1994 के तहत दण्डात्मक कार्यवाही की मांग पर कोई प्रतिक्रिया आया है ।

शासकीय नौकरी में बैकलॉग एवं नई भर्तियों पर आरक्षण रोस्टर लागू किया करने की मांग ।

पांचवी अनुसूची क्षेत्र में तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों पर भर्ती में मूलनिवासियों की शत् – प्रतिशत आरक्षण लागू किया जावे । संभाग एवं जिलास्तर पर भर्ती कराने की मांग ।

प्रदेश में खनिज उत्खनन के लिए जमीन अधिग्रहण की जगह लीज में लेकर जमीन मालिक को शेयर होल्डर बनाए जाए । गांव की सामुदायिक गौण खनिज का उत्खन्न एवं निकासी का पूरा अधिकार ग्राम सभा को दिया जावे । ग्राम सभा के द्वारा स्थानीय आदिवासी समिति के माध्यम से बेरोजगार युवाओं को खनि पट्टा की मांग ।

फर्जी जाति प्रकरण पर दोषियों पर शीघ्र कार्यवाही हो । छत्तीसगढ़ राज्य के 18 जनजातियों की मात्रात्मक त्रुटि में सुधार किया जाकर उन्हें जाति प्रमाण पत्र जारी किया जाए । अनुसूची में उल्लेखित जनजातियों का जाति प्रमाण – पत्र जारी नहीं करने वाले संबंधित अधिकारी पर दण्डात्मक कार्यवाही की मांग।

छात्रवृत्ति योजना में आदिवासी विद्यार्थियों के लिए आय की 2.50 लाख की पात्रता सीमा समाप्त किया गया है ।

आदिवासी समाज की लड़कीयों से अन्य गैर आदिवासी व्यक्ति से शादी होने पर उक्त महिला को जनजाति समुदाय के नाम से जारी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर जनप्रतिधिनित्व , शासकीय सेवा तथा जनजाति समुदाय की जमीन खरीदी पर रोक लगाने के लिए संबंधित अधिनियमों में आवश्यक संशोधन कि मांग।

आदिवासियों पर उत्पीडन जैसे – जमीन का हस्तातरण , महिला एवं बच्चों पर अत्याचार , हत्या , जातिगत अपमान पर अनुसूचित जाति , जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत पीड़ीत की प्राथमिकी दर्ज नही किया जा रहा । पीड़ीत को एफआईआर दर्ज करवाने के लिए अजाक थाना के चक्कर लगाने पड़ते है । इस पर राज्य सरकार कड़ाई से विशेष निर्देश जारी कर पालन करवाने की मांग ।

पेसा कानून की क्रियान्वयन नियम तत्काल बना कर अनुपालन सुनिश्चित करने की मांग ।

अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों को नियम विरूद्ध नगर पंचायत बनाया गया है । इन नगर पंचायतो को विखण्डित कर पुनः ग्राम पंचायत में परिवर्तित करने की मांग।

 

भविष्य मे इन क्षेत्रो को कई परियोजनाओ से है खतरा

1.पोलावरम बांध –  बस्तर के मुख्यत: माड़िया ,दोरला ,  परजा, जनजातिय समाज की विलुप्त के साथ साथ जमीन से बेदखल होने के कारण

2.बोधघाट जल परियोजना-  इस परियोजना से मुरिया, माड़िया जन जाति को प्रभावित कर जल जंगल जमीन से आदिवासी समुदाय को वंचित होना।

3.परियोजना के नाम पर, कैंप खोलने के नाम पर ,खदानों को लीज/ कंपनी को देने के नाम पर हो । विगत वर्षों में फर्जी ग्रामसभा के माध्यम से बैलाडीला के 13 नंबर पहाड़ी को  लीज पर देना हो सिलगेर में पुलिस कैंप खोलना हो, आलनार में आरती कंपनी रायपुर को लीज पर देना हो,  दंतेवाड़ा की केशापुर पडेवार क्षेत्र में जिंदल स्टील प्लांट के द्वारा फर्जी ग्राम सभा कर लीज में देना हो, उसी तरह से बस्तर ब्लाक के ग्राम चपका में मेसर्स गोपाल स्पंज एंड पावर प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी ने  फर्जी ग्राम सभा के माध्यम से  लीज में देना इन सभी से आदिवासियों  समस्याओं को झेल रहे हैं।

स्वतंत्र राज्य की मांग का क्या है उद्देश

अलग राज्य बनाकर ५ठी अनुसूची लागू हो जिससे आदिवासीयो का समुचित विकास हो सके और अपने फैसले वो खुद ले सके।

लगातार विभिन्न परियोजनाओ के नाम पर होने वाले आदिवासी विस्थापन पर रोक लगे।

आदिवासी का स्वतंत्र राज हो जिससे उनके मूलभूत जरूरियात व विकास के मुद्दे उपेक्षित ना हो।

भील आदिवासी गणसमूह संरक्षण हेतु आदिवासियों की संस्कृति रीति रिवाज  भाषा – बोली को पाठ्यक्रम मे शामिल करना।

मजदूरी से उपर उठकर स्वशाषित रोजगार व स्वनिर्भरता को बढावा देना।

ज्यादातर खेती किसानी पर निर्भर आदिवासी समुदाय को पानी उपलब्ध करवाकर बस्तर राज्य मे कृषि मे उन्नति करना।

पहले से मांग जारी है-

1 पूर्व बस्तर सांसद स्व. बलिराम कश्यप ने  बस्तर को अलग राज्य की मांग को लेकर कहा था कि बस्तर के आदिवासियों को अपना अधिकार दिलाना है तो सबसे पहले बस्तर को राज्य बनाने की जरूरत हैं।

2. 20 सितम्बर  2017 को बस्तर संभाग आयुक्त कार्यालय में आदिवासी समाज के  समाज प्रमुखों के सामने  पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम व कांकेर पूर्व सांसद  सोहन पोटाई ने भी मांग को जायज ठहराया गया था।

  1. वर्तमान समय में कई आदिवासी समाज के कार्यक्रमो में मांग करते आ रहे हैं।

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