संवैधानिक  नासमझ वाली राजनीतिक प्रतिनिधित्व की उपज हैं  बस्तर की बीमारी : सतीश नेताम – Channelindia News
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संवैधानिक  नासमझ वाली राजनीतिक प्रतिनिधित्व की उपज हैं  बस्तर की बीमारी : सतीश नेताम

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बीजापुर(चैनल इंडिया)|  वर्तमान में बस्तर संभाग के बीजापुर जिले के अंतर्गत सिलगेर नामक ग्राम में सीआरपीएफ कैंप की विधि विरुद्ध  स्थापना को लेकर विरोध कर रहे ग्रामीणों पर फायरिंग से 3 आदिवासियों की मौत से यह मामला पूरे देश में नक्सलवाद की असल वजह  को जानने के लिए सभी आतुर हैं निश्चित तौर पर इस पर चर्चाएं होनी चाहिए। सर्व आदिवासी समाज छत्तीसगढ़ के प्रदेश संयुक्त सचिव सतीश नेताम द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि नक्सल समस्या 90 के दशक से बस्तर संभाग में प्रवेश किया है यह समस्या राजनैतिक आर्थिक है तो इसका समाधान भी राजनीतिक ही होगा लेकिन बस्तर संभाग के 12 विधानसभा और 2 लोकसभा क्षेत्रों से निर्वाचित विधायक एवं सांसद चार दशकों से इस गंभीर बीमारी का कोई समाधान करते हुए गम्भीर  नहीं पाए गए हैं कोई भी जनप्रतिनिधि इस विषय को विस्तार से चर्चा करने के लिए विधानसभा एवं लोकसभा में पटल पर नहीं रखा गया है इस समस्या से यहां की जनजाति जनप्रतिनिधि अपने आप को दूर रखते हैं संविधान निर्माताओं ने इसके लिए जनजाति सलाहकार परिषद का प्रावधान किया गया है लेकिन दुर्भाग्य है इस परिषद की बैठक में सिर्फ  275 मद की फंड की बंदरबाट का प्रस्ताव पारित किया जाता है जबकि इस बैठक में इन क्षेत्रों के लिए सामान्य क्षेत्रों से अलग प्रावधान पर बात होनी चाहिए।  ऐसा क्यों किया जाता है किसी समस्या का समाधान तभी होगा जब उस पर गंभीरता से सभी पक्षों पर चर्चा होगी तभी उसका निराकरण के रास्ते खुलेंगे।

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सतीश नेताम ने आगे बताया कि वर्तमान घटना में 20 दिन बाद भी बस्तर संभाग के  जनप्रतिनिधियों का मुंह नहीं खुलना क्या दर्शाता है पुरे देश भर की जनजाति समुदाय एवं अन्य प्रदेशों की जनजाति जनप्रतिनिधियों के द्वारा राष्ट्रपति एवं प्रदेश की राज्यपाल को इस मामले पर संज्ञान ले कर उच्च स्तरीय जांच करने की मांग तथा देश भर की जनजातियों के द्वारा सोशल मीडिया में   ट्विटर  पर इस मामले को उठाया गया तब प्रदेश में 15 साल राज करने वाली भारतीय जनता पार्टी की नींद खुली और बीजेपी प्रदेश प्रभारी के फटकार के बाद जांच दल गठित किया गया वहीं दूसरी ओर सत्ताधार दल 20 दिन की चिरनिद्रा के  बाद खाना पूर्ति करने के लिए 9 सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया। इसके पहले के घटनाओं पर विश्लेशण करने से भी बस्तर के तत्कालीन जनप्रतिनिधियों की उदासीनता ही प्रमुख कारण प्राप्त होता है जिसका खामियाजा पुलिस बल एवं यहां के निर्दोष ग्रामीण आदिवासी शिकार हुए हैं सर्व आदिवासी समाज अब हिंसा बर्दाश्त करने से तंग आ चुका है और यह मांग करता है कि इस बीमारी से निजात पाने के लिए वह सभी प्रक्रियाएं अपनाई जाए जिससे यहां पर शांति स्थापित हो सके और यह शांति स्थापना भारत के संविधान में निहित है जनजाति क्षेत्रों के लिए अनुसूची 5 का प्रावधान है इसी प्रावधान के अनुसरण के लिए संसद ने 1996 में भूरिया कमेटी की अनुशंसा पर पेशा कानून को पास किया और प्रकृति और जनजाति में संतुलन स्थापित करने के लिए 2006 में तथा वनों की संरक्षण के लिए जनभागीदारी सुनिश्चित करने के लिए वन अधिकार अधिनियम बनाया गया इन दोनों कानूनों में जनजाति क्षेत्रों की आत्मा बस्ती है अब इन दोनों कानूनों का राज्य सरकार द्वारा और इन जन प्रतिनिधियों के द्वारा लगातार अवहेलना किया जा रहा है समाज के यह दावा है कि इन दोनों कानूनों को ईमानदारी पूर्वक धरातल पर उतारेंगे तो निश्चित तौर पर जनजातियों का विश्वास और विकास दोनों होगा। प्रदेश की जनजाति समुदाय राज्य स्थापना के बाद यह अच्छे से देख चुकी है की इस बीमारी से जनजाति समुदाय का ही सर्वाधिक विनाश हो रहा है। यह भी देख चुकी है कि कांग्रेस जब विपक्ष में होती है तो वह पीड़ितों के साथ होती है और जब सत्ता में यह पार्टी आती है तो उसकी मुंह बंद हो जाती है वही हाल बीजेपी का है जब वह सत्ता में होती है तब मुंह बंद होती है और जब विपक्ष में  होती है तो उसके जबान खुलता है  इसका समाधान क्या है दोनों पार्टियों के पास कोई इसका समाधान नहीं है मात्र औपचारिकता के लिए एक दूसरे के ऊपर आरोप मढ़ते रहते हैं । इसका समाधान सिर्फ संविधान के प्रावधान हैं। सर्व आदिवासी समाज इस समस्या से निजात के लिए अब किसी भी हद तक जाने को तैयार है इस बीमारी से त्रस्त आ चुके हैं सहनशीलता एवं धैर्य की सीमा समाप्त हो गई है राज्य सरकार को चाहिए कि ईमानदारी से संविधान में प्रदत्त प्रावधानों एवं यहां की वास्तविक स्थिति के आधार पर बस्तर की जनप्रतिनिधियों को गंभीरता के साथ लगातार इस विषय पर सभी पक्षों से चर्चा करते हुए शांति स्थापित करते हुए सम्यक विकास की ओर बढ़ने की जरूरत है।

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