मर्यादा का पालन कैसे करना है भगवान राम के चरित्र से सीखें : संत विजय कौशल

मर्यादा का पालन कैसे करना है भगवान राम के चरित्र से सीखें : संत विजय कौशल

रायपुर से रविशंकर शर्मा की रिपोर्ट 

रायपुर। व्यक्ति, वस्तु और विषय से जो प्रभावित न हो वही साधु है। जो अपमान से विचलित न हो वही साधु है। जो इन्ही विषयों से लिपट गया वह संसारी और जो सध गया वही साधु है। साधु -संत तो साधना का मार्ग बताते हैं., जिससे जीवन नैया पार करने का मार्ग प्रशस्त होता है, वे उन मंदिरों या चमत्कारी महात्माओं के बारे में नहीं कह रहे हैं जहां भीड़ की धक्के खाने के बाद भी लोग पहुंचते हैं,लेकिन पड़ोस की मंदिर में जाने के लिए समय नहीं है। जो हमारे मन में है वहीं तो विधि विधान से प्रार्थना करने के लिए देवता के पास जाते हैं। उनके प्रति श्रद्धा, भक्ति, भाव होता है तो मूर्ति भी संकेत देते हैं- बोलने लगते हैं. मूल में है भाव, श्रद्धा, करूणा ये अंतर्मन की बात है। चींटी से लेकर हाथी तक यह समझते हैं। इसीलिए तो कहा है..हरि व्यापक सर्वत्र समाना।
दीनदयाल उपाध्याय आडिटोरियम में श्रीराम कथा के तीसरे दिन संत विजय कौशल महाराज ने बताया कि राम और कृष्ण दोनों एक ही हैं। कृष्ण ने लीलाएं की है और राम ने चरित्र करके दिखाया है। बचपन से लेकर ही उन्होने मर्यादा का पालन किया है। माता, पिता, गुरु का आर्शिवाद उन्होने लिया है-पाया है। आर्शिवाद आंखों से मिलते है शब्दो से नहीं। यदि इनका आर्शिवाद पा लिया तो किसी और के पास गिड़गिड़ाने की जरूरत नहीं हैं। आर्शिवाद मांगे नहीं बल्कि बंटोरे जाते हैं। यह बहते हुए तेल के समान है जिसे ह्दयरूपी कटोरे में रखा जाता है। मर्यादा का पालन कैसे करना है,भगवान राम के जीवन चरित्र से सीखने की जरूरत है।
हमारी प्रवृति कलियुग है,जिसमें कोई निसाचर विचरण न करें इसलिए सिर को कभी खाली मत रखिए। उन्होने चरित्र को उम्र की पड़ाव से जोड़कर तीन चरण बताये। एक-जब तक कुंवारे हैं तब तक माता पिता के इज्जत का ख्याल रखें कोई भी आचरण व्यवहार करने से पहले केवल इतना सोंच ले कि कोई क्या कहेगा.कोई दोष नहीं लगेगा। दो-जब शादीशुदा हो गये तो छोटे बच्चों को सिर पर बिठा लो मतलब यदि आपके किसी आचरण व्यवहार गलती का बच्चों को पता चलेगा तो उन पर क्या असर पड़ेगा? तीन-जब 40-45 हो गए तो गुरु का इज्जत सिर पर रखिए, वो सुनेंगे तो क्या कहेंगे? व्रत,पूजा,पाठ,अनुष्ठान,तीर्थ यात्रा से कुछ नहीं होने वाला और कुछ नहीं है तो कथा को सिर पर रख लीजिए। जो छोटे को आदर दे वही भगवान है। भगवान राम ने अपने चरित्र में करके दिखाया है।
भूल करना अपराध है लेकिन बार-बार करना महाअपराध है। जानबूझकर की गई गलती को तो विधाता भी माफ नहीं करते हैं इसे तो भोगना ही पड़ता है। पाप को जितना छुपाओगे उतना ही भारी पड़ता है। अपराध को-गलती को बता दिया या स्वीकार लिया तो भगवान भी उन्हे इससे मुक्त कर देते हैं। अहिल्या उद्धार प्रसंग को जोड़कर उन्होने यह बातें बतायी।
मां के लिए बेटे के प्यार से बढ़कर कुछ नहीं
कथा प्रसंग के बीच में व्यासपीठ से संत विजय कौशल महाराज ने बताया कि मां के लिए बेटे के प्यार से बढ़कर कुछ नहीं है। कभी भी बच्चों व पत्नी के सामने उन्हे फटकार मत लगाइये। लेकिन विडंबना आज के बेटे के पास उस मां के लिए समय नहीं है जिसने प्रसव वेदना सहकर उसे जन्म दिया है। यदि मां बीमार है तो नर्स,डाक्टर लगा दिया लेकिन यदि मां की पलंग पर बैठकर केवल इतना पूछ लिया कि मां ठीक तो है न तो सारी बीमारी दूर हो जायेगी।