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सेक्स महिलाओं का हक, पर मर्दों को कैसे समझाएं….जानिए मामला

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सेक्स को लेकर देश में तमाम गलतफहमियां हैं। इसलिए इसमें नीम हकीमी भी खूब चलती है। 75 साल के सेक्सॉलजिस्ट प्रकाश कोठारी ने हजारों लोगों को नीम हकीमों से बचाया है। उन्होंने बताया कि किस तरह से वक्त के साथ सेक्स को लेकर लोगों की सोच बदल रही है। कैसे आज के युवा इसमें नए प्रयोग कर रहे हैं

डॉ. प्रकाश कोठारी का जैसा नाम है, वैसा ही काम। उन्होंने हजारों लोगों को वह रोशन राह दिखाई है, जो सेक्स समस्याओं के अंधेरे में जिंदगी काट रहे थे। सेक्स थेरेपी में देश में उनके कद का शायद ही कोई दूसरा डॉक्टर है। विदेश में भी उनकी शोहरत है।

मुंबई के मशहूर KEM अस्पताल में वह 55,000 से ज्यादा मरीज देख चुके हैं। किसी सरकारी अस्पताल की ओपीडी में सेक्स समस्याएं सुलझाने का यह शायद पहला प्रयोग था। वह 1970 से सेक्स प्रॉब्लम्स का इलाज कर रहे हैं। डॉ. कोठारी कहते हैं कि जब उन्होंने सेक्स समस्याओं का इलाज करना शुरू किया था, तब से लेकर आज के हालात में जमीन-आसमान का फर्क है।

1970 के दशक में पुरुष अपनी समस्या लेकर अकेले आते थे। जब उन्होंने इलाज शुरू किया, तो पहले चार साल में एक भी महिला उनके पास नहीं आई। आज औरतें अपने पतियों को साथ लेकर आती हैं। वे पति की समस्याओं की जानकारी फोन पर भी देती हैं। वे समझ गई हैं कि सेक्स उनका बुनियादी हक है, लेकिन मर्दों को अभी तक यह बात समझ में नहीं आई है।

पुरुषों में सेक्स समस्या अधिक
सेक्स समस्या पुरुषों में अधिक होती है या महिलाओं में? डॉ. कोठारी के अनुसार, ऐसी समस्याएं ज्यादातर मर्दों में होती हैं। खासतौर पर उन्हें उत्तेजना संबंधी दिक्कत होती है। औरतों की भी समस्याएं हैं। वे चरम सुख पर पहुंचने संबंधित समस्याएं लेकर आती हैं। उनके पास 70 प्रतिशत पुरुष और 30 प्रतिशत महिला पेशेंट आते हैं। डॉ. कोठारी ने यह भी बताया कि आज सेक्स को लेकर प्रयोग बढ़ गया है।

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एक बदलाव यह भी आया है कि 60-65 साल के जो नॉर्मल पुरुष हैं, वे कहते हैं कि डॉक्टर साहब ऐसा उपाय बताइए कि मेरी सेक्सुअल पावर 10-15 साल और बरकरार रहे। पहले कभी उनके पास ऐसे मरीज नहीं आते थे। 45 साल से अधिक उम्र की महिलाएं अक्सर ये जानने आती हैं कि सहवास दर्दभरा न हो, इसके लिए क्या करना चाहिए।

खुलापन बढ़ा है
डॉ. कोठारी एक और बदलाव का भी जिक्र करते हैं। वह कहते हैं कि लोगों में सेक्स को लेकर खुलापन आ गया है। पहले लोग गुपचुप रहते थे। अपनी समस्या छुपाते थे या बता नहीं पाते थे। उन्हें इसके लिए सही शब्द नहीं मिलते थे। मीडिया और इंटरनेट की मदद से लोगों की जानकारी बढ़ी है। अब लोग खुलकर अपनी समस्या बताते हैं। अब कई डॉक्टर भी इसमें एक्सपर्टाइज हासिल कर रहे हैं। पहले तो सेक्सॉलजिस्ट का नाम लेने से भी लोग कतराते थे।

डॉ. कोठारी ने अफसोस के साथ यह भी बताया कि इसके बावजूद सेक्स वर्जित यानी टैबू सब्जेक्ट बना हुआ है। यह भी सच है कि पहले की तुलना में यह कम हुआ है। क्या वक्त के साथ सेक्स समस्याएं भी बदली हैं। डॉ. कोठारी ने बताया कि 99 फीसदी समस्याएं वही हैं।

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कुछ लोग कहते हैं कि दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है और आप अब भी वही हस्तमैथुन, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन और कमजोरी पर अटके हैं। सचाई यही है कि आज भी मेरे पास जो मरीज आते हैं और ईमेल से जो ढेरों सवाल आते हैं, उनमें इन्हीं 4 समस्याओं के बारे में सबसे ज्यादा पूछा जाता है। इनके बारे में हमारे समाज में गलतफहमियां गहरे धंसी हुई हैं।

मैस्टर्बेशन से कमजोरी का वहम
डॉ. कोठारी ने कहा, ‘जब मैं MBBS के फाइनल ईयर में था, तो खुद मेरे मन में हस्तमैथुन (मैस्टर्बेशन) से कमजोरी का वहम था। मुझे भी इससे निकलने में 10 साल लग गए। इस फील्ड में आने की वजह भी यह थी कि जैसे मेरी गलतफहमी दूर हुई है, वैसे ही दूसरों की भी इस गलतफहमी को दूर कर सकूं।’

उन्होंने बताया, ‘20-21 साल की उम्र में मैं डॉक्टरी पढ़ रहा था। तब मैस्टर्बेशन से जुड़ी गलतफहमियों का शिकार होकर परेशान रहने लगा था। फिर मैं एक हकीम और कथित सेक्स एक्सपर्ट से मिला। इनमें से एक का इश्तहार पढ़कर मैं मुंबई से दिल्ली के एक दवाखाने तक भी गया।

इत्तेफाक की बात है कि मेरी कहानी सुनने के बाद और पूरी तरह शारीरिक जांच के बाद इन दोनों ने एक ही सवाल पूछा कि क्या तुमने बचपन में काफी मैस्टर्बेशन किया है। मुझे उस वक्त इन पर पूरा भरोसा हो गया कि इन्होंने मेरी बीमारी की जड़ पकड़ ली है।’ उसके बाद उन्होंने दवाओं के शाही, बादशाही और आलमशाही हर तरह की कीमत वाले कोर्स बताए।

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डॉ. कोठारी ने कहा कि तब मेरे पास अधिक पैसे नहीं होते थे। इसलिए मैंने सस्ता इलाज चुना। लेकिन उससे कोई फायदा नहीं हुआ। उन्होंने कहा, ‘इसके बाद जब मैंने उनसे कोई असर न होने की बात कही तो उन्होंने मर्ज पुराना बताते हुए महंगे इलाज की सलाह दे डाली। उस कोर्स से भी फायदा नहीं हुआ। फिर मैंने दूसरे वाले एक्सपर्ट को आजमाया। उसका नतीजा भी कुछ नहीं निकला। तब मैं डॉक्टरी की पढ़ाई के फाइनल ईयर में था। मुंबई के KEM अस्पताल में पढ़ाई कर रहा था। वहां मेरे जैसे कई मरीज भी आते थे, लेकिन उनकी मदद करने के लिए कोई डॉक्टर नहीं था।’

मैस्टर्बेशन पर आयुर्वेद क्या कहता है?
उन्होंने बताया, ‘तब मैंने अपने जैसे मरीजों के लिए आयुर्वेद के मूल ग्रंथों- चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांगहृदय का अध्ययन किया। हैरानी की बात यह थी कि आयुर्वेद के इन तीनों महाग्रंथों में न तो मैस्टर्बेशन को बीमारी बताया गया है और न ही इसके लिए किसी तरह के इलाज की चर्चा है। यहां तक कि वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’ में भी इसे बीमारी नहीं माना गया। शुरू में मेरे पास जो भी मरीज आए, मैं उनको दिलासा देता था कि मैस्टर्बेशन नॉर्मल है। इसे बीमारी न समझें और कोई फिक्र न करें।’

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