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गाय के गोबर को भूल जाइए, चिंपैंजी के मल से जानलेवा कोरोना को मिलेगी मात!

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अभिलाष गौड़, नई दिल्ली
पिछले सप्ताह, 82 साल के ब्रायन पिंकर लेने वाले दुनिया के पहले शख्स बने थे। जल्द ही भारत में भी किसी को यह वैक्सीन लगेगी। आने वाले समय में कोरोना के खिलाफ वैक्सीनेशन न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील में शुरू होगी। अबतक वैक्सीन के 2.6 अरब डोज बेचे जा चुके हैं। दूसरे स्थान पर मौजूद नोवावैक्स के ऊपर ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ने 100 फीसदी की बढ़त ले ली है क्योंकि नोवावैक्स की वैक्सीन को अभी मंजूरी ही नहीं मिली है।

आखिर बना कैसे कोरोना का टीका?
तो जब आप अपनी शर्ट की स्लीव्स उठाकर वैक्सीन लेने के लिए अपनी बाजू बढ़ाएं तो एक बार जरूर सोचिएगा कि आखिर ये वैक्सीन आया कहां से है। निश्चित तौर एक फार्मास्युटिकल फैक्टरी से लेकिन उससे भी पहले कहां से? जब इस टीका पर रिसर्च शुरू हुई?

सुपरहीरोज की तरह हर वैक्सीन की ऑरिजन स्टोरी
जैसे किसी सुपरहीरोज के बनने की स्टोरी होती है, वैसे ही किसी वैक्सीन की भी ऑरिजन स्टोरी होती है। रूस की स्पूतनिक वैक्सीन दो कॉमन कोल्ड वायरस Ad5 और Ad26 के मिलन से बनी। यह समझना बेहद आसान है कि वैज्ञानिकों ने कैसे उसे हासिल किया होगा। नोज स्वैब (Nose Swab) या मरीज के प्रयोग किए जाने वाले रूमाल या कपड़े से भी ऐसे वायरस को आप पा सकते हैं।

चिपैंजी के मल से कोरोना वैक्सीन!
लेकिन ऑक्सफोर्ड वैक्सीन चिंपैंजी में सर्दी का कारण बनने वाले एक वायरस से बनी है। ऐसे में अब सवाल उठता है कि कैसे चिंपैंजी का स्वैब लिया गया उसके छींकने के बाद रूमाल से उसका मुंह साफ किया गया। तो जान लीजिए, वैज्ञानिकों को ऐसा कुछ नहीं करना पड़ा। जर्नल कैमिकल ऐंड इंजीनियरिंग में छपी न्यूज के अनुसार, उन्होंने केवल एक बीमार चिंपैंजी का चेहरा ढूंढा बस। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने 8 साल पहले ChAdOx1 (चिंपैंजी एडिनोवायरस ऑक्सफोर्ड 1) विकसित किया था। इस वैक्टर का इस्तेमाल कोविड वैक्सीन के अलावा फ्लू, जीका और चिकनगुनिया में भी होता रहा है।

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गुरिल्ला के मल से भी बनेगी वैक्सीन?
तो, चिंपैंजी के मल से दुनिया की रक्षा होने वाली है। एक और बात जान लीजिए कि अभी गुरिल्ला का मल भी पाइपलाइन में है। इटली की एक कंपनी रेईतेरा ने गुरिल्ला के एडिनोवायरस के जरिए कोरोना का टीका विकसित किया है। इस वायरस को खाने के बाद निकले अपशिष्ट पदार्थ से लिया गया था। सितंबर तक यूरोपीय यूनियन और इटली की कंपनी के साथ वैक्सीन GRAd-COV2 की डील के लिए बातचीत कर रही थी। लेकिन उसके बाद से कोई खबर नहीं आई है। इटली की ला रिपब्लिका न्यूज पेपर के अनुसार, रेईतेरा फंड की कमी से जूझ रही है और उसके इस वैक्सीन के बड़े पैमाने पर ट्रायल की प्रक्रिया प्रभावित हुई है।

जापान में कैसे होगा ओलंपिक?
हर चार साल में ओलंपिक का आयोजन होता है। लेकिन 2020 में तोक्यो में होने वाला ओलंपिक कोरोना महामारी के कारण टल गया था। सौभाग्य से इस खेल को रद्द नहीं किया गया और इस साल 23 जुलाई से 8 अगस्त तक इसका आयोजन किया जाना है। लेकिन इसके लिए कोरोना वैक्सीनेशन एक अहम कड़ी होगी। ओलंपिक में बड़े पैमाने पर विदेशी खिलाड़ी आएंगे और उनको वैक्सीन देना होगा। सबसे अहम यह होगा कि जापान को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोरोना वायरस उसकी राजधानी में न मिले। हाल की रिपोर्ट में यह पता चला है कि ऐसा आसान नहीं होगा।

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जापानियों को वैक्सीन में नहीं भरोसा
सीएनएन ने लैंसेट की रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि जापान ऐसे देशों में हैं जहां वैक्सीन पर भरोसा सबसे कम होता है। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो जापानी लोग वैक्सीन को लेकर बेहद चौकन्ना रहते हैं। इसके पीछे पुराने घाव और घटनाएं हैं।

जितने भी कोविड-19 वैक्सीन को मंजूरी मिली है, उनमें से कई नए तकनीक पर आधारित हैं। परंपरागत वैक्सीन की तुलना में इसके ज्यादा साइड इफेक्ट भी देखने को मिला है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार ट्रायल के दौरान 80% कोरोना की वैक्सीन से दर्द और 50 प्रतिशत से थकान और सिरदर्द की शिकायत हुई। इससे लोग और चिंतित हो सकते हैं क्योंकि जापान में ऐसी वैक्सीन कभी नहीं लगी जिसमें इतना ज्यादा साइड इफेक्ट हो।

जापान में कोरोना की वैक्सीन मिलेगी मुफ्त
एक रोचक बात ये भी है कि जापान ने अपने सभी नागरिकों को लिए कोविड वैक्सीन को मुफ्त में देने की घोषणा कर रखी है। लेकिन लोगों में इसे लेकर कोई रूचि नहीं है। 30 प्रतिशत से भी कम जापानी मानते हैं कि वैक्सीन सेफ, अहम और प्रभावी होते हैं। अभी स्थिति ये हैं कि जापान फरवरी के आखिर तक इम्युनेशन की प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकता है। जापान ने 2.9 करोड़ डोज ऑर्डर किया है। जापान की आबादी के हिसाब से ये काफी है।

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उत्तर कोरिया का क्या होगा?
दुनिया में अलग-थलग रहने वाला देश उत्तर कोरिया रॉकेट तो बना सकता है लेकिन वैक्सीन रॉकेट साइंस नहीं है। उनके लिए वैक्सीन बनाना आसान नहीं है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर कोरिया ने आसपास के देशें से आग्रह किया है। उसने साथ ही गावी से भी आग्रह किया है। गावी ऐसा संगठन है जो गरीब देशों को वैक्सीन मुहैया कराता है। यही नहीं किम जोंग उन का देश कुछ यूरोपीयन अंबैसी का दरवाजा भी खटखटाया है।

2016 में लौटते हैं। एक फीमेल चिंपैंजी, जिसका नाम डैली (Dallae) था, वह प्योंगयंग चिड़ियाघर में लाइटर जलाकर सिगरेट पीती हुई स्टार बन गई थी। उम्मीद है कि किम जोंग उन के वैज्ञानिक अब उस चिंपैंजी के मल को एकत्र करने में जुटे होंगे और उम्मीद कर रहे होंगे कि इस गलती के लिए किसी को सजा न मिले।

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